चमन रो-रो के कहता है, रुला कर चल दिये शैलेंद्र 

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हिंदी फिल्म, हिंदी साहित्य और भोजपुरी साहित्य, तीनो में, अपने शब्दों, अपने क्लासिकल निर्देशन, अपनी जनपक्षधरता, अपने गीतों की लाजवाब मिठास से पहचाने जाने वाले मशहूर गीतकार शैलेंद्र का आज (30 अगस्त) जन्मदिन है। हिंदी फिल्मी दुनिया और साहित्य दोनों, का एक ऐसा नाम, ऐसी अजीमोशान शख्सियत, जिसे जानने, पढ़ने, सुनने, लिखने के वक्त में जिंदगी के एक अलग तरह के शानदार तजुर्बे से गुजरना होता है। वह नाम है शैलेंद्र, और घर का नाम शंकरदास केसरीलाल। यद्यपि अब वह इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन अपने शब्दों में शैलेंद्र पूरी दुनिया को जोर-जोर से बड़ी हिम्मतवर आवाज देते हैं।

तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर, अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

राजकपूर के साथ बातचीत में मशगूल शैलेंद्र
राजकपूर के साथ बातचीत में मशगूल शैलेंद्र
"बिना शक शंकर शैलेन्द्र को हिन्दी सिनेमा का आज तक का सबसे बड़ा लिरिसिस्ट कहा जा सकता है। उनके गीतों को खुरच कर देखें और आपको सतह के नीचे दबे नए अर्थ प्राप्त होंगे। उनके एक ही गीत में न जाने कितने गहरे अर्थ छिपे होते थे..." :गुलज़ार

राजकपूर ने एक बार एक कार्यक्रम के दौरान ही शैलेंद्र की कविता- ‘जलता है पंजाब’ सुनने के बाद प्रस्ताव रखा कि वह इस गीत को अपनी फिल्म ‘आग’ में लेना चाहते हैं। शैलेंद्र ने तपाक से दोटूक जवाब दिया कि मेरी कविताएं बेंचने के लिए नहीं होती हैं।

हिंदी फिल्म, हिंदी साहित्य और भोजपुरी साहित्य, तीनो में, अपने शब्दों, अपने क्लासिकल निर्देशन, अपनी जनपक्षधरता, अपने गीतों की लाजवाब मिठास से पहचाने जाने वाले मशहूर गीतकार शैलेंद्र का आज (30 अगस्त) जन्मदिन है। उनका जन्म रावलपिंडी में और देहावसान हुआ मुम्बई में। शैलेंद्र ने 13 दिसंबर 1966 को अस्पताल में 'मेरा नाम जोकर' फिल्म का गीत 'जीना यहां, मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां' पूरा करने के लिए राजकपूर को बुलाया था, लेकिन अगले दिन वह दुनिया छोड़ चले। बाद में उनके बेटे शैली शैलेन्द्र ने इस गीत की लाइनें पूरी कीं। आरा (बिहार) के गांव धुसपुर के निवासी शैलेन्द्र के पिता केसरीलाल राव ब्रिटिश काल में मिलिट्री हॉस्पिटल में ठेकेदार थे।

बचपन से ही शैलेन्द्र उनके साथ रावलपिंडी और मथुरा में रहे। मातृगांव से कोई नाता-रिश्ता नहीं। उका परिवार केसरीलाल की बीमारी के दिनो में माली हालत खराब होने पर मथुरा (उ.प्र.) आ गया था। वहां उन्हें काफी दुख झेलने पड़ा। उन्हे बीड़ी पीने के लिए मजबूर किया जाता ताकि भूख न लगे। उन्हीं दिनो इकलौती बहन इलाज न होने से चल बसी। तरह-तरह की मुश्किलें और जात-पांत के दंश झेलते हुए आखिरकार वह मुंबई जाकर रेलवे में बतौर अपरेंटिस मैकेनिकल इंजीनियरिंग में काम करने लगे।

गीतकार शैलेंद्र और संगीतकार शंकर जयकिशन ने एक साथ, एक ही फिल्म 'बरसात' से सितारों की दुनिया में कदम रखा था। उस फिल्म में शैलेंद्र के गीत के बोल थे- 'बरसात में तुमसे मिले हम सजन..।' शैलेंद्र ने ज्यादातर राज कपूर के साथ फिल्मों पर काम किया। एक बार राजकपूर ने उनसे पूछा कि वे जीवन के हर रंग और जिंदगी के हर फलसफे पर इतनी आसानी से गीत कैसे लिख देते हैं? शैलेंद्र का जवाब था- ‘अगर सुबह न होती तो बॉम्बे में ये सूनी सड़कें न होतीं. और ये सूनी सड़कें न होतीं तो मैं अपनी तन्हाई में डूब न पाता और मेरे दोस्त, तुम्हें ये गीत न मिलते।’ उनके ज्यादातर फिल्मी गीतों ने लोकप्रियता के नए मानदंड स्थापित किए, जैसे....आवारा हूँ, रमैया वस्तावैया, मुड मुड के ना देख मुड मुड के (श्री ४२०), मेरा जूता है जापानी, आज फिर जीने की, गाता रहे मेरा दिल, पिया तोसे नैना लागे रे, क्या से क्या हो गया (गाईड), हर दिल जो प्यार करेगा, दोस्त दोस्त ना रहा (संगम), सब कुछ सीखा हमने, किसी की मुस्कराहटों पे (अनाड़ी), सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है, दुनिया बनाने वाले कैसी ये दुनिया बनाई (तीसरी कसम) आदि।

गुलज़ार लिखते हैं- 'बिना शक शंकर शैलेन्द्र को हिन्दी सिनेमा का आज तक का सबसे बड़ा लिरिसिस्ट कहा जा सकता है। उनके गीतों को खुरच कर देखें और आपको सतह के नीचे दबे नए अर्थ प्राप्त होंगे। उनके एक ही गीत में न जाने कितने गहरे अर्थ छिपे होते थे।' राजकपूर ने मुस्कराते हुए कहा- ‘आप कुछ भी कहें लेकिन, पता नहीं क्यों मुझे आप के अंदर सिनेमा का एक सितारा नजर आता है।' इसके बाद वह शैलेंद्र को एक पर्ची थमाकर लौट गए। पर्ची में लिखा था- ‘जब जी चाहे, इस पते पर चले आना।’ वह दिन आया भी। गर्भवती पत्नी की चिकित्सा के लिए उनके जेब में फूटी कौड़ी न थी। तब उन्होंने राजकपूर के दरवाजे पर दस्तक दी। उस दिन राजकपूर ने उन्हें गीत का शीर्षक दिया- बरसात में तुमसे मिले हम। इसी मुखड़े पर गीत 'बरसात' के लिए लिखा शैलेंद्र ने, जो करोड़ों जुबानों पर छा गया। बताते हैं कि एक बार संगीतकार शंकर-जयकिशन ने 'रंगोली' फिल्म के लिए उनसे गीत लिखने की फरमाइश की। उस वक्त जय किशन बार-बार वहां खड़ी एक सुंदर लड़की को मुड़कर देख रहे थे।' शैलेंद्र ने तुरंत इन लाइनों से उन्हें टोका- मुड़-मुड़ के न देख, मुड़-मुड़ के। बाद में यही मुखड़ा 'रंगोली' का मशहूर गाना बना।

शैलेन्द्र के पुत्र दिनेश शंकर शैलेन्द्र ने 'अंदर की आग' नाम से अपने पिता की कविताओं के संकलन को राजकमल प्रकाशन से छपवाया। इसकी भूमिका में दिनेश ने पिता की जाति धुसिया चर्मकार लिख दिया। इस पर आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने शैलेन्द्र को संत रविदास के बाद सबसे महत्वपूर्ण दलित कवि कह दिया। इसका लेखकों ने विरोध किया। एक वाकया और। मुंबई में दिनेश की शादी की वर्षगाँठ पर उनके घर से बदमाश सारे सामान समेत शैलेन्द्र की कविताओं, चिट्ठियों की पांडुलिपियां, ट्राफियां आदि लूट ले गए।

बताते हैं कि राजकपूर ने एक बार एक कार्यक्रम के दौरान ही शैलेंद्र की कविता- ‘जलता है पंजाब’ सुनने के बाद प्रस्ताव रखा कि वह इस गीत को अपनी फिल्म ‘आग’ में लेना चाहते हैं। शैलेंद्र ने तपाक से दोटूक जवाब दिया कि मेरी कविताएं बेंचने के लिए नहीं होती हैं। वह उन दिनो रेलवे में नौकरी करने के साथ ही कविताई भी करते रहते थे। इस पर अपने अधिकारियों की आपत्ति झेलते-झेलते एक दिन आजिज आकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के साथ हो लिए।

जावेद अख्तर कहते हैं- 'जीनियस थे शैलेन्द्र. दरअसल, शैलेन्द्र का रिश्ता बनता है कबीर और मीरा से. बड़ी बात सादगी से कह देने का जो गुण शैलेन्द्र में था, वो किसी में नहीं था. यहाँ तक कि ‘गम दिए मुस्तकिल’ से लेकर ‘आज मैं ऊपर आसमाँ नीचे’ जैसे गाने लिखने वाले मज़रूह साहब ने एक बार खुद मुझसे कहा था कि सच पूछो तो सही मायनों में गीतकार शैलेन्द्र ही हैं। शैलेन्द्र का रिश्ता उत्तर भारत के लोक गीतों से था। लोक गीतों में जो सादगी और गहराई होती है, वो शैलेन्द्र के गीतों में थी। ‘तूने तो सबको राह दिखाई, तू अपनी मंजिल क्यों भूला, औरों की उलझन सुलझा के राजा क्यों कच्चे धागों में झूला। क्यों नाचे सपेरा' अगर क्यों नाचे सपेरा जैसी लाइन मैं लिख पाऊँ तो इत्मीनान से जीऊँगा।' उन्होंने बड़ी मुश्किलों के दौर में ही ‘तीसरी कसम’ फिल्म बनाई, जो पहले तो चली नहीं, उनको बर्बाद कर गई। बाद में वह इतनी लोकप्रिय हुई कि जिस खुशी को साझा करने के लिए शैलेंद्र इस दुनिया में रहे ही नहीं। आइए, उनका एक लोकप्रिय गीत पढ़ते हैं-

रुला कर चल दिये इक दिन, हँसी बन कर जो आये थे। चमन रो-रो के कहता है कभी गुल मुस्कुराये थे।अगर दिल के ज़ुबां होती तो ग़म कुछ कम तो हो जाताउधर वो चुप इधर सीने में हम तूफ़ां छुपाये थे। चमन रो-रो के कहता है।ये अच्छा था न हम कहते किसी से दास्तां अपनीसमझ पाये न जब अपनेपराये तो पराये थे। चमन रो-रो के कहता है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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