कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अभियान चला रही है कॉलेज की एक प्रोफेसर

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देश भले ही 21वीं सदी पहुंच गया हो, देश को एक उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति के रूप में देखा जा रहा हो, लेकिन इस तस्वीर का दूसरा कड़वा सच ये भी है कि यहां पर आज भी लड़के और लड़की में भेद किया जाता है। कई राज्यों में आज लड़कियों की जन्म दर चिन्ताजनक रूप से काफी गिर गयी। इनमें हरियाणा जैसा राज्य भी शामिल है जो आर्थिक रूप से संपन्न माना जाता है, लेकिन कन्या भ्रूण हत्या, पर्दा प्रथा और घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों को लेकर बदनाम भी है। हरियाणा के झज्जर जिले में रहने वाली डॉक्टर संतोष दहिया इन्ही सामाजिक बुराईयों को दूर करने और महिलाओं और लड़कियों को समाज में सम्मान दिलाने का बीड़ा उठाया है।


डॉक्टर संतोष दहिया अहलावत मूल रूप से झज्जर जिले के बीघल गांव की रहने वाली हैं। ग्रामीण परिवेश में रह चुकी डॉक्टर संतोष के मुताबिक पहले की तरह आज भी हरियाणा में लड़के और लड़कियों में भेद किया जाता है। घर में किसी बाहरी पुरूष के आने पर लड़की से कहा जाता है कि वो उनके सामने ना जाये। क्योंकि समाज में लड़की और औरत का मतलब होता है इज्जत। और इज्जत का मतलब होता है कोई उसे देख न ले। डॉक्टर संतोष बताती हैं वो एक शिक्षित और संपन्न घराने से संबन्ध रखती हैं। उनके नानाजी स्वतंत्रा सेनानी थे। उनके पिता आर्मी में और भाई नेवी में थे। इसके बावजूद उनके साथ भी भेदभाव हुआ। बचपन से ही उन्हें ये भेदभाव बहुत कचोटता था। वो देखती की औरतें सारा दिन काम करतीं हैं और आदमी हल्का फुलका काम ही करते थे या फिर वो इधर उधर घूम अपना समय बर्बाद करते थे। बचपन में उनको सख्त हिदायत थी कि किसी भी आदमी के सामने सर नीचा करके रहो और उनके सामने जुबान मत खोलो। एक घटना को याद करते हुए डॉक्टर संतोष बताती हैं कि “एक बार जब मैं 7वीं क्लास में पढ़ती थीं उस वक्त एक आदमी जो की रिश्ते में मेरा भाई लगता था वो एक दिन शराब के नशे में अपनी पत्नी की डंडे से पिटाई कर रहा था। मौहल्ले के लोग उससे कह रहे थे कि वो अपनी पत्नी को ना मारे, बावजूद कोई भी उसे रोक नहीं रहा था। ये देखकर मुझे काफी गुस्सा आया। मैंने रिश्ते के उस भाई से डंडा छीना और उसकी पिटाई कर दी। ये देखकर वहां मौजूद लोग उल्टे मेरी ही आलोचना करने लगे और कहने लगे कि लड़की होकर तेरी इतनी हिम्मत। लेकिन मेरी मां ने मुझसे कहा कि बेटी तूने जो किया वो ठीक किया। जब तक लड़कियां मजबूत नहीं होगीं तब तक ये अत्याचार ऐसे ही चलता रहेगा। ” इसी तरह की एक और घटना को याद करते हुए संतोष बताती हैं कि “साल 1987 में मैं और एक लड़का राज्य स्तरीय बॉलीबॉल टूर्नामेंट में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुने गये जिसके बाद इनाम में लड़के को 500 रूपये और मुझे 200 रूपये मिले। मुझे ये देखकर बहुत बुरा लगा। मैंने मीडिया से कहा कि वो भी सर्वेश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया है और मैं भी। बावजूद इनाम में ये भेदभाव गलत है अगर इनके पास पैसे नहीं थे तो ये हम दोनों को ही 100 रूपये दे देते। मेरा कहना था कि बात पैसे की नहीं थी। बात थी बराबरी की, बात थी सम्मान की। क्योंकि हम दोनों को ही महिला और पुरुष वर्ग में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया था।”


डॉक्टर संतोष कुल 8 बार बॉलीबॉल चैम्पियन और 4 बार की स्विमिंग चैम्पियन रह चुकी हैं। इसके अलावा क्रॉस कंट्री रेस में उनकी भारत के लिए 8वीं रैंक आई है। खेलकूद के साथ पढ़ाई में होशियार डॉक्टर संतोष ने कुरूक्षेत्र यूनिवर्सिटी से पीएचडी की है। डॉक्टर संतोष का मन इतना सब कुछ हासिल कर लेने के बाद भी उसी गांव में बसता था जहां वो पैदा हुई जिन महिलाओं और बुर्जगों के बीच वो बैठती और बात करतीं थी। वो महिलाएं उनसे शिकायती लहजे में कहती थी कि बेटी औरतों की कोई नहीं सुनता और इस बात की टीस उन्हें हमेशा रहती थी कि वो उनके लिए कुछ नहीं कर पा रहीं हैं। तब डॉक्टर संतोष ने फैसला किया कि वो अपने जीवन में महिलाओं के लिए ही काम करेगीं।डॉक्टर संतोष पिछले 12-13 सालों से बेटी बचाओ मुहिम में जुड़ी है। इसके लिए वो हस्ताक्षर अभियान चलाया हुआ है। वो कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ गांव गांव जाकर लोगों से हस्ताक्षर करवाती हैं और उनको शपथ दिलाती है कि वो लड़कियों को नहीं मारेगें। अब तक वो 50 हजार हस्ताक्षर और करीब 1 लाख लोगों को शपथ दिला चुकीं हैं। इसके अलावा वो स्कूल, कॉलेज या गांव की पंचायत में जाकर लोगों को बेटी बचाओ अभियान के बारे में समझाती हैं कि समाज को आगे बढ़ाने के लिये बेटियां कितनी जरूरी हैं। अपनी इस मुहीम में उन्होने 15 अगस्त 2015 को हिसार के मुजादपुर गांव को गोद लिया है। जहां पर 1 हजार पुरुषों पर लड़कियों का अनुपात केवल 273 है। यहां पर वो आशा वर्कर और आगनवाड़ी के माध्यम से जागरूकता अभियान चला रहीं हैं। साथ ही वहां पर 7 गांवों की पंचायत के लोगों को उन्होने इसमें शामिल किया है। इसमें उन्होने समाज के हर उम्र को लोगों को शामिल कर 11–11 लोगों की एक टीम बनाई है। उनकी कोशिशों को देखते हुए सरकार ने उन्हें कुरूक्षेत्र और झज्जर में भी बेटी बचाओ अभियान के लिये रोल मॉडल चुना है।


डॉ. संतोष ना केवल कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ काम कर रही हैं बल्कि वो चाहती हैं कि लड़कियां 12वीं तक की पढ़ाई जरूर करें। इसके अलावा वो घरेलू हिंसा पर भी काम कर रही हैं। उनका दावा है कि वो पिछले कुछ सालों के दौरान बिना कानूनी मदद के हजारों मामले निपटा चुकी हैं। डॉक्टर संतोष महिलाओं को लेकर कितनी गंभीरता से काम कर रही हैं इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वो सर्वमहाखाप पंचायत की पहली महिला अध्यक्ष चुनी गई हैं। घुंघट या पर्दा प्रथा हरियाणा में काफी संवेदनशील मसला है, डॉक्टर संतोष ने जब पर्दा प्रथा का विरोध किया तो समाज के साथ साथ खाप पंचायत के कुछ लोगों ने इनका विरोध किया। बावजूद उन्होने पर्दा प्रथा के खिलाफ अपना अभियान जारी रखा। डॉक्टर संतोष के मुताबिक “आजादी को मिले करीब 70 साल होने को हैं और अगर आज भी हम महिलाओं को पर्दे में कैद रखेंगे तो उनका विकास कैसे होगा। इसी बात को ध्यान में रखते हुए मैंने पर्दा मुक्त हरियाणा पर काम करना शुरू किया। मैं इस अभियान में उन लोगों को भी साथ लेने की कोशिश करती हूं जो हम महिलाओं को पर्दे में देखना चाहते हैं।” डॉक्टर संतोष को उम्मीद है कि उनकी ये मुहिम भले ही धीमी हो लेकिन समाज में बाल विवाह जैसी दूसरी कुरितियों की तरह इसका भी अंत होगा। वो लोगों को समझाती हैं कि अगर आज साइना नेहवाल या मैरी कॉम जैसी खिलाड़ियों से पर्दा करने को कहा जाये तो क्या वो इस तरह देश का नाम रोशन कर पाएंगी। यही वजह है कि उनके इस मिशन को न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी प्रमुखता से अपने अखबार में जगह दी थी। डॉक्टर संतोष भले ही सालों से महिलाओं के उत्थान पर काम कर रही हों लेकिन तीन साल पहले ही उन्होने अपने संगठन ‘अखिल भारतीय महिला शक्ति मंच’ की नींव रखी है। इसके जरिये वो महिलाओं से जुड़े विषय जैसे बेटी बचाओ अभियान, घरेलू हिंसा, बेटियों की सुरक्षा, शिक्षा और अधिकार पर काम करते हैं। डॉक्टर संतोष का मानना है कि हमें जो ये जिंदगी मिली है उसमें हम समाज के लिए कुछ अच्छा काम करें, अगर हम डर कर रहेंगे तो एक कदम भी नहीं चल पाएंगे।

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