कश्मीर में महिला पत्रकार होने का मतलब है तलाक!

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एक तो पत्रकारिता में वैसे महिलाओं के सामने तमाम मुश्किलें रहती हैं, यदि कहीं उन्हें किसी अशांत क्षेत्र में रहते हुए वहां के हालात पर कलम चलानी पड़े, फिर तो बेइंतहा दुश्वारियां। कश्मीर में तो महिला पत्रकारों को भीतर-बाहर की तमाम चुनौतियों के साथ तलाक तक सामना करना पड़ रहा है।

घाटी के जैसे हालात है, भारत सरकार को वहां की हर गतिविधि पर इसलिए भी फूंक-फूंक कर सतर्क नजर रखनी पड़ती है कि एक खबर तिल का ताड़ बना सकती है। फोर्स के लिए लेनी की देनी पड़ सकती है। देश विरोधी शक्तियां आतंकवाद की आड़ में लगातार कोई न कोई खूनी गुल खिलाने की फिराक में रहती हैं। 

पत्रकारिता तो रोजाना देश-दुनिया की ढेर सारी बातें करती है लेकिन खुद पत्रकारों को अपने मिशनरी सरोकारों और चुनौतियों के बारे कुछ कहने और लिखने की कितनी मोहलत है अथवा समाज और देश उसे कितना जरूरी-गैरजरूरी मानता है, यह हमारे समय का एक सबसे ज्वलंत सवाल है। ऐसे में यदि आए दिन महिला पत्रकारों के सामने आने वाले टिपिकल किस्म के चैलेंज की बात करें तो विश्व पत्रकारिता की ओर से पाकिस्तान, बांग्लादेश व अन्य मुस्लिम देशों के साथ जम्मू-कश्मीर अथवा पूर्वोत्तर भारत में महिला पत्रकारों की चुनौतियों का परिदृश्य भी जहन में उभरता है।

ऐसे ही हालात पर इन दिनो जम्मू-कश्मीर में ताजा-ताजा अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट की भारतीय ब्यूरो चीफ एनी गोवेन की रिपोर्टिंग की स्वतंत्र को लेकर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला टिप्पणी कर रहे हैं कि 'क्या कश्मीर में हालात इस हद तक खराब हो गए हैं कि अब हम विदेशी संवाददाताओं को कश्मीर में स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग करने की मंजूरी देने से डर रहे हैं?' एनी गोवेन अपनी दोस्त की शादी के लिए कश्मीर में हैं। एनी कहती हैं कि 'वह रिपोर्टिंग नहीं कर सकतीं, क्योंकि विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय द्वारा विदेशी पत्रकारों के दी जानी वाली आवश्यक विशेष मंजूरी उन्हें नहीं मिली है। उन्होंने 22 जून को इसके लिए आवेदन किया था, जिसमें आवंछनीय देरी हो रही है।'

वह ट्वीट करती हैं - 'I'm not breaking "d" law. I am complying with @MEAIndia and @HMOIndia new enforcement of a "long dormant" rule that says foreign correspondents need a permit to work in Kashmir. Totally unworkable in my view.' गौरतलब है कि जम्मू एवं कश्मीर में रिपोर्टिंग के लिए विदेशी पत्रकारों को सन् 1990 के दशक की शुरुआत से गृह मंत्रालय की अनुमति लेनी होती है।

घाटी के जैसे हालात है, भारत सरकार को वहां की हर गतिविधि पर इसलिए भी फूंक-फूंक कर सतर्क नजर रखनी पड़ती है कि एक खबर तिल का ताड़ बना सकती है। फोर्स के लिए लेनी की देनी पड़ सकती है। देश विरोधी शक्तियां आतंकवाद की आड़ में लगातार कोई न कोई खूनी गुल खिलाने की फिराक में रहती हैं। ऐसे में पत्रकारों का जीवन भी खतरे में रहता है। 'राइजिंग कश्मीर' अख़बार के संपादक शुजात बुखारी की अभी डेढ़ माह पहले ही गोली मारकर हत्या हो चुकी है। इसका मकसद और कुछ नहीं, सिर्फ उनकी आवाज़ को खामोश कर देना था। वह अपनी लेखनी से लगातार कश्मीर में शांति बहाली की लड़ाई लड़ रहे थे।

इसी तरह दक्षिण भारत में महिला पत्रकार गौरी लंकेश को जघन्य तरीके से मौत की नींद सुला दिया गया। अभी हाल ही में पाकिस्तान की मशहूर पत्रकार एवं महिला ब्लॉगर गुल बुखारी को लाहौर शहर की सड़क से उठा लिया गया। सोशल मीडिया पर इस अपहरण के लिए खुफिया एजेंसियों को जिम्मेदार बताए जाने के कुछ घंटों के भीतर ही वह घर वापस पहुंच गईं। अपहरण से पूर्व गुल बुखारी रात करीब 11 बजे अपने कार्यक्रम के लिए ‘वक्त टीवी’ जा रही थीं। बाद में गुल के परिवार ने स्थानीय थाने में उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करायी थी। इस पर पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की बेटी मरियम नवाज की टिप्पणी थी कि ‘गुल बुखारी के अपहरण की खबर बहुत परेशान करने वाली है। यह बुहत क्रूर, नीच दर्जे की ज्यादती है।’

कश्मीर में महिला पत्रकारों की तादाद बहुत ही कम है। पूरी घाटी में कुल लगभग डेढ़ दर्जन ही महिला पत्रकार हैं। कुछ वर्ष पहले कश्मीर की महिला पत्रकार रज़िया जान जब अपने पत्रकारीय जीवन के पहले ही दिन अखबार के दफ़्तर पहुंचीं- न्यूज़रूम में पुरुष पत्रकारों का उनसे सवाल था - 'कोई औऱ काम नहीं मिला जो यहां चली आई?' रज़िया ने तभी ठान लिया था कि इस राज्य में पत्रकारिता भले आसान न हो, वह अवश्य कुछ अलग कर दिखाना चाहती हैं। अब तो मीडिया में काम करते हुए उनके एक दशक हो चुके।

रज़िया कहती हैं - 'इस बात में कोई शक नहीं कि कश्मीर में एक औरत के लिए पत्रकारिता करना मुश्किल है। समाज हो या फिर यहां के हालात, हर जगह औरत के लिए चुनौती है। समाज में महिला के पत्रकार होने पर उठने वाले सवालों का भी जवाब देना पड़ता है। कश्मीर में एक महिला पत्रकार को जब सुरक्षा एजेंसियों के साथ अपने काम के हवाले से संपर्क बनाना पड़ता है तो लोग शक की नज़र से देखते हैं। एक महिला पत्रकार के लिए कश्मीर में शादी करना भी कोई आसान बात नहीं है। शादी की बात आने पर जब लड़के वाले ये सुनते हैं कि लड़की पत्रकार है तो वो हाथ पीछे खींच लेते हैं। इस क़िस्म की सोच को बदलने की ज़रूरत है। आख़िर एक लड़की पत्रकारिता करते हुए जीवन में आगे क्यों नहीं जा सकती?'

घाटी की एक अन्य महिला पत्रकार फ़रज़ाना ('कश्मीर न्यूज़' की संपादक) को कश्मीर में पत्रकारिता करते लगभग डेढ़ दशक होने वाले हैं। फ़रज़ाना का तलाक हो जाने के पीछे सबसे प्रमुख वजह उनकी पत्रकारिता ही थी। वह बताती हैं- 'शादी के बाद मेरे पति ने पहले मुझसे कहा कि मैं नौकरी करूं, लेकिन कुछ ही समय के बाद उन्होंने कहा कि मीडिया की नौकरी नहीं करनी है। ज़्यादातर परिवारों में पति मानते हैं कि मीडिया में मर्दों के साथ ज़्यादा संबंध रखना पड़ता है। मैं पत्रकारिता छोड़ना नहीं चाहती थी, जिसके बाद आख़िर तलाक़ पर बात आ गई।'

विगत एक दशक से 'कश्मीर इमेजेज़' में अंग्रेजी पत्रकारिता कर रहीं ज़ीनत ज़ीशान फ़ाज़ली कहती हैं- 'आज से 10 वर्ष पहले बहुत ही कम महिलाएं कश्मीर में पत्रकारिता करती थीं लेकिन अब महिलाएं पत्रकारिता में आगे आ रही हैं, अब सोच बदल गई है। जब मैं पत्रकारिता के इस मैदान में आई थी तो हम दो या तीन महिला पत्रकार ही थीं जबकि आज ये तादाद बीस तक पहुंच चुकी है।'

एक अन्य महिला पत्रकार एवं लेखिका हैं राणा अय्यूब, जिनको विगत जून माह से बलात्कार और हत्या की धमकियां मिल रही हैं। गौरतलब है कि वर्ष 2002 के गुजरात दंगों पर उनकी 'गुजरात फाइल्स: एनाटॉमी ऑफ़ अ कवर-अप' नाम से पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने भी राणा को धमकियां दिए जाने का संज्ञान लेते उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम करने को कहा है।

राणा मीडिया से अपने अंदेशे साझा करती हुई बताती हैं- 'उन्हें धमकियां तो हमेशा से मिली हैं लेकिन पहले धमकियां ऑनलाइन मिलती थीं। कुछ समय से अब उन्हें फ़ोन पर भी जान से मारने की धमकियां दी जा रही हैं। मेरे नाम का एक पॉर्न वीडियो बनाया गया है, जिसमें मॉर्फ करके मेरा चेहरा लगा दिया गया है। इसे फ़ोन पर, व्हॉट्सऐप के ज़रिए फैलाया जा रहा है। मेरा फ़ोन नंबर और मेरा पता ट्विटर पर ट्वीट किया गया है, जिसमें लिखा गया है, 'आई एम अवेलेबल' यानी 'मैं उपलब्ध हूं।' जिस तरह की गंदगी मैंने इस बार देखी वैसी पहले कभी नहीं। मेरे नाम से इस तरह के ट्वीट किए गए हैं कि मैं बच्चों के बलात्कारियों का समर्थन करती हूं और मैं भारत और भारतीयों से नफ़रत करती हूं। मुझे सामूहिक बलात्कार की धमकियां मिल रही हैं। मैंने 26 अप्रैल को दिल्ली के साकेत पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है।'

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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