बाहर ऐसी स्थिति है कि चुप रहे तो गए!

समकालीन कवि-कथाकार 'विष्णु नागर' के जन्मदिन पर विशेष...

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"हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि-कथाकार विष्णु नागर जी का आज जन्मदिन है। उनका समकालीन हिंदी कवियों में एक शीर्ष नाम है। उनकी कविताएं हमारे समय के सच की हर पल खोज-खबर लेती रहती हैं, जैसे कोई हमारे भी भीतर तक जमा कचरे के ढेर पर उंगलियां उठा रहा हो। वे जितने श्रेष्ठ कवि हैं, उनके भीतर का मनुष्य उससे भी बड़ा है। जीवन और समाज की टेढ़ी-मेढ़ी राहों की तरह उनकी चिंताएं गंभीर हैं। वह उन चिंताओं के अनुपात में ही अपने शब्दों को तेवर, साहस और धार देते हैं..."

समकालीन कवि-कथाकार विष्णु नागर। फोटो साभार: फेसबुक
समकालीन कवि-कथाकार विष्णु नागर। फोटो साभार: फेसबुक
"विष्णु नागर की कविता अपना कथ्य स्वयं निर्मित करती है। सहज सीधी जुबान में, तमाम कलात्मक गढ़ंत-मढ़ंत की बिना परवाह किये बेलाग-लपेट शब्दों में सवालों का सामना करती मिलती है। कमोबेश यही वजह है, कि उनकी कविता का मूल स्वर राजनीतिक है।"

विष्णु नागर का समकालीन हिंदी कवियों में एक शीर्ष नाम है। उनकी कविताएं हमारे समय के सच की हर पल खोज-खबर लेती रहती हैं। जैसे कोई हमारे भी भीतर तक जमा कचरे के ढेर पर उंगलियां उठा रहा हो। उनकी कविताएं अपना कथ्य स्वयं निर्मित करती हैं।

"हर स्वप्न के लिए नींद चाहिए,

हर नींद के लिए थकान।"

ये शब्द हैं विष्णु नागर के। वह हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि-कथाकार हैं। 14 जून, आज उनका जन्मदिन है। उनके रचना-संसार से रू-ब-रू होने से पहले आइए, ब्रजेश कानूनगो के शब्दों से गुजरते हैं, जिसमें छिपा है नागर-व्यक्तित्व का संपूर्ण। 'किताब की आखिरी पंक्ति तक पुस्तक मेले में दिख गए गौरीनाथ के पास बैठे विष्णु नागर। साथ आने को कहा तो स्टाल से उतर कर तुरंत चले आए मेरे साथ। ....लगता था, कह रहे हों- ले चलो मुझे बाहर मालवा की हवा में सांस लेना चाहता हूँ थोड़ी देर। वे मेरे साथ हो लिए। बहुत सरल और इतने सहज कि जब मैंने बताया, कल लीलाधर मंडलोई भी आए थे मेरे साथ तो वे खुश हुए। यह जानकर तो और भी कि चंद्रकांत देवताले, असगर वजाहत और मंगलेश डबराल के आने के पहले निराला और मुक्तिबोध भी पिताजी के साथ इसी तरह आ चुके हैं।.... शायद स्वभाव नहीं था उनका, फिर भी बताते रहे कि किस तरह जीवन भी कविता हो जाता है। घर पहुँच कर सुनाने लगे घर के बाहर का हाल। बहुत दुखी थे। अपने रिश्तेदारों के बारे में बताते हुए। मुम्बई के बम विस्फोट का क़िस्सा सुनाते हुए भीग गईं उनकी आँखें। आश्चर्य तो तब हुआ जब हिटलर के नाम पर उन्हें गुस्सा आया पर आँगन में लगे पेड़ पर चिड़िया को देखकर खिल पड़े विष्णु नागर। बाल-बच्चों की खबर लेने-देने का हुआ जरूरी काम। साथ बैठकर खाए हमने दाल बाफले, चौराहे तक गए पान चबाने। प्रेम के बारे में टुकड़ों–टुकड़ों में करते रहे बात। इस तरह बने रहे विष्णु नागर मेरे साथ किताब की आखिरी पंक्ति तक।' विष्णु नागर लिखते हैं-

"मेरे भीतर इतना शोर है
कि मुझे अपना बाहर बोलना
तक अपराध लगता है
जबकि बाहर ऐसी स्थिति है
कि चुप रहे तो गए!"

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"कवि विष्णु नागर जितने श्रेष्ठ कवि हैं, उनके भीतर का मनुष्य उनसे कम बड़ा नहीं है। जीवन और समाज की टेढ़ी-मेढ़ी राहों की तरह उनकी चिंताएं गंभीर हैं। वह उन चिंताओं के अनुपात में ही अपने शब्दों को तेवर, साहस और धार देते हैं।"

विष्णु नागर का समकालीन हिंदी कवियों में एक शीर्ष नाम है। उनकी कविताएं हमारे समय के सच की हर पल खोज-खबर लेती रहती हैं। जैसे कोई हमारे भी भीतर तक जमा कचरे के ढेर पर उंगलियां उठा रहा हो। कहा जाता है, 'उनकी कविता अपना कथ्य स्वयं निर्मित करती है। सहज सीधी जुबान में, तमाम कलात्मक गढ़ंत-मढ़ंत की बिना परवाह किये बेलाग-लपेट शब्दों में सवालों का सामना करती मिलती है। कमोबेश यही वजह है कि उनकी कविता का मूल स्वर राजनीतिक है।' अपनी धार और मार के लिए उनकी कविताएं झुंड में भी सबसे अलग दिखती हैं, अलग तरह से अपने प्रतिद्वंद्व पर झपटतीं और अपने पाठकों को समझाती-बुझाती हैं, गिने-चुने प्रश्न कर मानो सवालों की झड़ी सी लगा देती हैं-

"एक अकेला पंक्षी
जब आधी रात को चहचहाता है
तो इसके मायने क्या हैं ?
क्या सिर्फ यह कि उसकी नींद
समय से पहले खुल गई है
और उसका समय बोध गड़बड़ा गया है
और वह भौंचक है कि दूसरे पंक्षी
क्यों चहचहा नहीं रहे ?
और वह दूसरों से कह रहा है कि
भई तुम भी चहचहाओ
जागो, जागो, मैं बार-बार कहता हूं
कि अब जागो, भोर भई।"

कवि विष्णु नागर जितने श्रेष्ठ कवि हैं, उनके भीतर का मनुष्य उनसे कम बड़ा नहीं है। जीवन और समाज की टेढ़ी-मेढ़ी राहों की तरह उनकी चिंताएं गंभीर हैं। वह उन चिंताओं के अनुपात में ही अपने शब्दों को तेवर, साहस और धार देते हैं। वह 'नवभारत टाइप्स' में पहले मुम्बई, तत्पश्चात् दिल्ली में विशेष संवाददाता सहित विभिन्न पदों पर रहे हैं। जर्मन रेडियो, 'डोयचे वैले' की हिंदी सेवा का 1982-1984 तक संपादन कर चुके हैं। साथ ही लगभग पांच वर्षों तक टाइम्स ग्रुप की पत्रिका 'कादंबिनी' के कार्यकारी संपादक भी रहे हैं। उनके लोकप्रिय कविता संग्रह हैं- मैं फिर कहता हूँ चिड़िया, तालाब में डूबी छह लड़कियाँ, संसार बदल जाएगा, बच्चे, पिता और माँ, हंसने की तरह रोना, कुछ चीजें कभी खोई नहीं, कवि ने कहा

साथ ही उनके कई कहानी संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं, जैसे आज का दिन, आदमी की मुश्किल, आह्यान, कुछ दूर, ईश्वर की कहानियाँ, बच्चा और गेंद। उनका एक सुपठनीय उपन्यास है - आदमी स्वर्ग में। इसके अलावा आलोचना संग्रह- कविता के साथ-साथ और कई निबंध संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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