...और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद खत्म हुआ तीन तलाक 

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सुप्रीम कोर्ट ने अमानवीय, दर्दनाक और विभेदकारी कुरीति से हिंद की मुस्लिम जमात की आधी आबादी को 21वीं सदी में मुक्ति प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है।

देश की सबसे बड़ी अदालत ने किया मुस्लिम जमात की आधी आबादी के हक में फैसला...

आखिरकार देश की सबसे बड़ी अदालत ने ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक करार देकर 1000 सालों से चली आ रही अमानवीय, दर्दनाक और विभेदकारी कुरीति से हिंद की मुस्लिम जमात की आधी आबादी को 21वीं सदी में मुक्ति प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। ज्ञात हो कि सायरा बानो ने तीन तलाक के खिलाफ कोर्ट में एक अर्जी दाखिल की थी, जिस पर सायरा का तर्क था कि तीन तलाक न तो इस्लाम का हिस्सा है और न ही आस्था। उन्होंने कहा था कि उनकी आस्था ये है कि तीन तलाक मेरे और ईश्वर के बीच में पाप है। यूं तो इस आंदोलन में अनेक याचिकाकर्ता हैं, मगर तीन महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने इस बहस को एक नया रूप देने का काम किया। वो हैं उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली सायरा बानो, पश्चिम बंगाल के हावड़ा की इशरत जहां और भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की संस्थापक जाकिया सोमन।

आज इन महिलाओं का संघर्ष एक क्रांतिकारी बदलाव की बुनियाद बना है। दरअसल तलाक एक ऐसा अल्फाज है जो न सिर्फ हंसते-मुस्कुराते परिवार के टुकड़े कर देता है बल्कि रिश्तों के मायने भी बदल देता है। हमारे देश में तीन तलाक का जहर पीने वाली ना जाने कितनी मुस्लिम महिलाएं हैं जो किसी ना किसी डर की वजह से खामोश रहती हैं और अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों को सहती हैं। ऐसे में महिलाओं के लिये सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय किसी बहार से कम नहीं है।

दीगर है कि 22 अगस्त दिन मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने, न सिर्फ ट्रिपल तलाक पर छह माह तक रोक लगा दी बल्कि केंद्र सरकार से छह माह के अंदर ट्रिपल तलाक पर कानून बनाने का आदेश भी दे दिया है। कोर्ट ने कहा कि अगर छह महीने में कानून नहीं बनाया जाता है तो तीन तलाक पर शीर्ष अदालत का आदेश जारी रहेगा। कोर्ट ने इस्लामिक देशों में तीन तलाक खत्म किए जाने का हवाला दिया और पूछा कि स्वतंत्र भारत इससे निजात क्यों नहीं पा सकता? कोर्ट में 3 जज इसे अंसवैधानिक घोषित करने के पक्ष में थे, वहीं 2 जज इसके पक्ष में नहीं थे। खास बात है कि ट्रिपल तलाक के फैसले में पांच जज शामिल हैं और पांचों ही जज अलग-अलग धर्मों के हैं।

खैर तीन तलाक के मसले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का केंद्र सरकार ने स्वागत किया है। सरकार कहना है कि देश की सर्वोच्च अदालत ने महिलाओं के हक में फैसला सुनाया है। यह लैंगिक बराबरी और सम्मान का मामला है। दरअसल किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का बुनियादी मूल्य होता है समानता। बिना समानता के कोई न्याय नहीं हो सकता। अन्यायपूर्ण कानूनों की मदद से न्याय सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। समय के साथ न्याय की अवधारणाएं भी बदलती हैं। पुराने समय में कानून को ईश्वरीय चीज माना जाता था, लेकिन आधुनिक समाज में कोई भी कानून तब तक नहीं उचित नहीं माना जा सकता, जबकि वह समानता के सिद्धान्त के अनुरूप न हो। अत: समय के साथ कानूनों में संशोधन होते रहना चाहिए। एक समानतापूर्ण समाज में न्याय कभी भी राजनीतिक हितों और सामाजिक समीकरणों के गणित का बंधक नहीं हो सकता है। अत: देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा तीन तलाक को असंवैधानिक करार देने से मुस्लिम समुदाय के लोगों या मौलवियों को आहत नहीं होना चाहिए क्योंकि जिस तरह से आज के दौर में तीन तलाक हो रहा है, वह पूरी तरह इस्लाम के खिलाफ है। हालांकि लखनऊ में मुस्लिम धर्मगुरु और ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा है कि अभी पूरा फैसला हमारे सामने नहीं आया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला होगा, हम स्वीकार करते हैं। 2 जज ने हमें असैंवैधानिक नहीं कहा है, हमारे लिए ये बड़ी बात है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य जफरयाब जिलानी कहते हैं कि अभी सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट नहीं आया है। जितनी सूचना आई है, उसमें बताया गया है कि 3-2 के जजमेंट से ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक कहा गया है। हमें ये देखना है कि जो बात हमने कहीं थी, क्या सुप्रीम कोर्ट के जजों ने उस पर गौर किया है। मिसाल के तौर पर करोड़ों मुसलमान औरतें, शरियत के पाबंद मानते हुए तीन बार तलाक होने के बाद अपने को तलाकशुदा मानेंगीं, उसके बाद क्या होगा? इस जजमेंट का असर उनके हक में होगा या उनके खिलाफ होगा। ये एक अहम मुद्दा था।

जफरयाब जिलानी ने कहा कि लेकिन ये तो वह खुद ही मानते हैं कि तीन तलाक का बगैर किसी कारण के दिया जाना गैरमुनासिब है। गुनाह है। उस प्रैक्टिस का खत्म करने के लिए बोर्ड खुद कोशिश कर रहा है। सरकार का कहना है कि चाहे कोई व्यक्ति किसी भी धर्म का हो.. लेकिन उसके संवैधानिक अधिकार बराबर हैं। एक महिला के सम्मान और उसकी गरिमा के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता। हलफनामे में यह भी लिखा है कि अलग-अलग धर्मों के पर्सनल ला महिलाओं की गरिमा से ऊपर नहीं हो सकते।

यहां शाह बानो केस का जिक्र करना भी जरूरी है क्योंकि इससे हमारे देश के राजनीतिक सिस्टम की खोखली सोच का पता चलता है। शाह बानो एक 62 वर्ष की मुसलमान महिला थी, जिनके पांच बच्चे थे। शाह बानो को 1978 में उनके पति ने तलाक दे दिया था। शाह बानो ने पति से गुजारा भत्ता लेने के लिए अदालत में अपील की। 1985 में इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया और शाह बानो के पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया।

भारत के रूढ़िवादी मुसलमानों ने इस फैसले का जमकर विरोध किया। उस दौर में ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड नाम की एक संस्था बनाई गई थी। पर्सनल लॉ के समर्थकों ने सभी प्रमुख शहरों में आन्दोलन करने की धमकी दी थी.. इसके बाद 1986 में राजीव गांधी की सरकार ने एक कानून पास किया जिसने शाह बानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को उलट दिया। आज 1985 नहीं 2017 है। मेरा देश कितना बदला है यह तो संसद में कानून बनने के समय ही ज्ञात होगा किंतु इतना तो तय है कि 1985 का जुल्म 2017 में इंसाफ चाहता है। और सियासी नफे-नुकसान की बुनियाद पर सही-गलत का फैसला करने करने वाली जमातों के वारिस सुन लें कि, वक्त हर जुल्म तुम्हारा तुम्हे लौटा देगा, वक्त के पास कहां रहमो-करम होता है।

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लेखक / पत्रकार

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