जन्मदिन पर विशेष: लच्छू महाराज के तबले की थाप पर थिरकते रहे गोविंदा

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पद्मश्री जैसा सम्मान ठुकरा देने वाले, जेल में तबला बजाकर इमेरजेंसी का विरोध करने वाले मस्तमौला संगीतकार लच्छू महाराज की 74वीं जयंती पर आज गूगल ने डूडल बनाकर उनकी अमूल्य स्मृतियों को साझा किया है। लच्छू महाराज मशहूर एक्टर गोविंदा के मामा और संगीत गुरु थे। उनके तबले की थाप पर थिरकते रहे गोविंदा।

लच्छू महराज
लच्छू महराज
अभिनेता राज बब्बर जब भी बनारस जाते, और सांझ की महफिल लगती, उसमें लच्छू महाराज के साथ उनकी बैठकी जमती थी। वे गुजश्ता खुशबुओं के दिन थे, अब कहां से आएंगे? 

गायन, वादन और नृत्य में अपने खांटी बनारसी अंदाज के लिए मशहूर, फ्रांसीसी महिला से शादी रचाने वाले लच्छू महाराज की 74वीं जयंती पर आज (16 अक्तूबर) गूगल ने डूडल बनाकर उनकी अमूल्य स्मृतियों को साझा किया है। मस्तमौला लच्छू महाराज अपनी इच्छा होने पर ही तबला बजाते थे। उन्होंने कभी भी किसी की मांग पर तबला नहीं बजाया। जैसे ही तबले पर उनकी थाप पड़ती, हर कोई झूम उठता था। बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता गोविन्दा लच्छू महाराज के भांजे हैं। उन्होंने बचपन में ही लच्छू महाराज को अपना गुरु मान लिया था। लच्छू महाराज जब कभी भी मुम्बई जाते, गोविन्दा के ही घर पर रुकते थे। जब 28 जुलाई, 2016 को उनका निधन हुआ तो बनारस के मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार के समय गोविन्दा ने कहा- 'पंडित लच्छू महाराज का निधन भारतीय शास्त्री संगीत की दुनिया के लिए बहुत बड़ी क्षति है। वह लब्ध प्रतिष्ठत तबला वादक थे। मेरी जिंदगी को कलात्मक संपदा से सम्पन्न करने में उनका प्राथमिक योगदान रहा।'

उनके देहावसान की सूचना मिलते ही गोविंदा अपनी शूटिंग कैंसिल कर बनारस पहुंच गए थे। गोविंदा जब भी वाराणसी जाते, लच्छू महाराज के साथ मिलकर तबला बजाया करते थे। बनारस घराने में लच्छू महाराज का घर का नाम लक्ष्मी नारायण सिंह था। उनका जन्म वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में 16 अक्टूबर 1944 को हुआ था। उनके पिता का नाम वासुदेव महाराज था। लच्छू महाराज बारह भाई-बहनों में चौथे थे। उन्होंने टीना नाम की एक फ्रांसीसी महिला से शादी की थी। शादी के बाद उनकी एक बेटी हुई। उन्होंने लगभग दस साल तक पंडित बिंदिदिन महाराज, उनके चाचा और अवध के नवाब के अदालती नर्तक से पूरा प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने पखवाज, तबला और हिंदुस्तानी शास्त्रीय स्वर संगीत भी सीखा। इसके बाद वह मुंबई चले गए।

अभिनेता राज बब्बर जब भी बनारस जाते, और सांझ की महफिल लगती, उसमें लच्छू महाराज के साथ उनकी बैठकी जमती थी। वे गुजश्ता खुशबुओं के दिन थे, अब कहां से आएंगे? लच्छू महाराज जब कभी बनारस से कादीपुर या लखनऊ जाते, अपने सुपरिचितों को पूर्व सूचना दे देते कि बदलापुर में मिलना यार, कुछ खा-पीकर आगे जाऊंगा। और बदलापुर गुलजार रहता, जब तक वह वहां रहते। लच्छू महाराज अपने स्वभाव में इतने सहज और साधारण थे कि वर्ष 2002-03 में यूपी सरकार की ओर से उन्हें पद्श्री दिया जा रहा था, लेकिन उन्होंने नहीं लिया। बाद में ये सम्मान उनके शिष्य पंडित छन्नू लाल मिश्र को मिला। आठ साल की उम्र में वह मुंबई में एक प्रोग्राम के दौरान तबला बजा रहे थे तो जाने-माने तबला वादक अहमद जान थि‍रकवा ने कहा था कि काश लच्छू मेरा बेटा होता। मुंबई में लच्छू महाराज ने महल, मुगल-ए-आजम, पाकीज़ा जैसी फिल्मों में तबला वादन किया। अपनी घनघोर श्रम-साधना से उन्हे स्वतंत्र तबला वादन और संगत दोनों में महारत हासिल मिली।

लच्छू महाराज को वर्ष 1957 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 1972 में केंद्र सरकार ने उनको ‘पद्मश्री’ से सम्मानित करने का फैसला किया लेकिन उन्होंने ‘पद्मश्री’ लेने से मना करते हुए कहा था कि श्रोताओं की वाह-वाह और तालियों की गूंज ही कलाकार का असली पुरस्कार होता है। उनके भाई राजेंद्र सिंह बताते हैं कि उनको केंद्र सरकार की ओर से पद्मश्री देने के लिए नामित किया गया था। उन्हें अवार्ड लेने का निमंत्रण पत्र भी भेजा गया, लेकिन अचानक उन्होंने मना कर दिया। वह कहते थे कि किसी कलाकार को अवार्ड की जरूरत नहीं होती। उन्होंने देश-दुनिया के तमाम बड़े आयोजनों में तबला वादन से लोगों का मन-प्राण झंकृत किया। भारत सरकार की ओर से सन् 1972 में उन्होंने 27 देशों का दौरा किया था।

लच्‍छू महाराज स्‍वाभि‍मानी और अक्‍खड़ स्‍वभाव के थे। उन्होंने अपने घराने के साथ अन्य प्रमुख घरानों- दिल्ली, अजरारा, लखनऊ और पंजाब- की शैली में भी खूब बजाया और उन्हें समृद्ध किया। उन्‍होंने इमरजेंसी के दौरान जेल में तबला बजाकर वि‍रोध जताया था। वह बनारस घराने के जरूर थे, लेकि‍न चारों घरानों की ताल एक कर लेते थे। उनका गत, परन, टुकड़ा कमाल का होता था। संगीत में स्वाभिमान जाहिर तौर पर तकलीफ देता है- आर्थिक और सामाजिक, दोनों ओर से, लेकिन सीना तानकर चलने का वैभव लेकर कम ही लोग जीते हैं। ऐसा ही एक शख्स संगीत में आता है, सामने तबला रखकर बैठ जाता है। शरीर किसी साधक की तरह सीधा है, केवल उंगलियां चल रही हैं, बीच में बाएं की गूंज दूर तक जाती है। ये रहे लच्छू महाराज।

तबला बजाते समय जो माहौल बनाते रहे, वह साधना की खोह में खुलता रहा। प्रेक्षक, दर्शक नहीं रह पाता, सुनने वालों की आंखें बंद रहती थीं और लच्छू महाराज अपने श्रोताओं को डोंगी में भरकर अनंत यात्रा में लेकर चल देते थे। स्वयं में निहायत गंभीर रहने वाले लच्छू महाराज अपनों में कमाल के किस्सागो हो जाते रहे, और पूरी कायनात ठहाकों से पाट देते थे। जब वह 'ताक धिन धिन्ना' की धुन निकालते तो पूरा माहौल झूम उठता था। गायक शमशेर अली समेत कई नामी-गिरामी कलाकार लच्छू महाराज के शिष्यों की सूची में शामिल हैं। उनकी फ्रांसीसी पत्नी और बेटी स्विट्जरलैंड जा बसीं लेकिन लच्छू महाराज ने कभी बनारस नहीं छोड़ा। धन और प्रसिद्धि की चाह उन्हें मुंबई में भी न रोक सकी। तबले की साधना करते रहे, अगली पीढ़ी को सिखाते-बताते रहे, पर कभी पद और पुरस्कार के फेर में नहीं पड़े।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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