विकास कौल, सौरव चौधरी और भास्कर अलापति की नयी पेशेवर उद्यमता का नाम है पंक्चरमैन

टायर सर्विस सेक्टर को संगठित करने की कोशिश के ख्याल से जन्मा नये व्यवसाय का आइडिया 

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इस सदी की शुरुआत के बाद से ही भारत में संगठित खुदरा बाजार तेजी से विकास करने लगा है, जो हर गुजरते दशक के साथ और संगठित होता जा रहा है। हालांकि, सेवा उद्योग अभी तक तरक्की नहीं कर पाया है।इनमें से टायर केयर सेगमेंट ज्यादातर अव्यवस्थित और असंगठित है। पंक्चरमैन के सह-संस्थापक विकास कौल का कहना है, “इस उद्योग की शुरुआत के पीछे सोच ये थी कि अव्यवस्थित टायर केयर सर्विस को पारदर्शी और स्वचालित तरीके से व्यवस्थित किया जाए।”

एक विचार का जन्म

विकास ने बताया कि सौभाग्यवश तीन लोग, विकास कौल, सौरव चौधरी और भास्कर अलापति काम के सिलसिले में कोलकाता गए थे। इस वेंचर में आने से पहले विकास एयरटेल में नेशनल डिस्ट्रीब्यूशन हेड थे और उनके पास कुल 18 साल का अनुभव था। इनके साथ आने वाले सौरव के पास 20 साल का अनुभव था। सौरव ईंधन उद्योग से जुड़े रहे हैं और वो ब्रिटिश पेट्रोलियम व एक्सॉन मोबिल के लिए काम कर चुके थे। भास्कर के पास 24 साल का अनुभव था, जिनमें से 23 साल तो वो अपोलो टायर्स के लिए काम कर चुके थे।

कोलकाता के टॉलीगंज क्लब में एक शाम को तीनों चर्चा कर रहे थे कि कैसे युवा उद्यमी तकनीक का इस्तेमाल कर एक मार्केटिंग प्लेस बनाकर लोगों की जिंदगी को आसान बना रहे हैं।ये बातचीत तब और गंभीर हो गई जब तीनों ने सोचा कि क्या पारंपरिक ब्रिक एंड मोर्टार मॉडल के जरिए भी जिंदगी को आसान बनाया जा सकता है। अलग-अलग पृष्ठभूमियों को देखते हुए तीनों ने अनुभवों का इस्तेमाल करते हुए समाधान तलाशने में कामयाबी हासिल की। विकास ने बताया,

 “हममें से एक का टायर इंडस्ट्री में 23 साल का अनुभव था, तो वो टायर केयर सर्विस की समस्याओं को अच्छी तरह से जानते थे और इसके समाधान तलाशने के लिए हम तीनों सहमत हुए। अलग-अलग पृष्ठभूमि का होना यहां फ़ायदेमंद साबित हुआ।”

लागू करने का विचार

तीनों इस बात को लेकर तो स्पष्ट थे कि उन्हें करना क्या है, लेकिन तीनों इसे लेकर सुनिश्चित नहीं थे कि इस पर आगे कैसे बढ़ना है। विकास ने कहा कि उन्होंने अपना यूरेका मोमेंट तब देखा जब उन्होंने साइमन सिनेक के ‘द गोल्डन सर्कल’ को देखा। इसके बाद से ही उनके किसी समस्या के समाधान तलाशने का नजरिया ही बदल गया। हर समाधान के लिए क्यों, क्या और कैसे सवालों के साथ तलाश शुरू की गई। विकास बताते हैं, “उस दिन के बाद से हमारे लिए सब कुछ बदल गया।”

वह बताते हैं कि उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती तब सामने आई जब उन्हें कामयाब कारपोरेट करियर को छोड़ने का फैसला लेना पड़ा। उनके सामने सवाल ये खड़ा था कि इतने साल तक जिस काम को उन्होंने किया, क्या उन्हें उसी काम के साथ बने रहना चाहिए या फिर उन्हें अपने सपने को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए? विकास ने बताया कि जब उन्होंने देखा कि युवा पेशेवर उद्यमिता की ओर बढ़ रहे हैं, तो उन्होंने अपने आप को दिलासा दिया कि युवाओं के पास उतनी जिम्मेदारियां नहीं जितनी कि उनके पास हैं। फिर भी तीनों ने अपने विश्वास की ओर छलांग लगा ही दी।

इन्होंने अपने वेंचर का नाम पंक्चरमैन रखा और अक्टूबर, 2013 में इसकी सेवाएं शुरू की। ये लोग देश भर के 22 शहरों में मौजूद 175 कियॉस्क के जरिए अपनी सेवाएं संचालित कर रहे हैं। फिलहाल इनकी सेवा जिन शहरों में मौजूद हैं, उनमें दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू, पुणे, हैदराबाद, कोलकाता, अहमदाबाद, गुड़गांव, नोएडा, फरीदाबाद, मेरठ, बरेली, देहरादून, मथुरा, आगरा, नागपुर, तिरुपति, वाराणसी, गोवा, गाजियाबाद, मुरादाबाद और हल्दिया शामिल हैं।

पंक्चरमैन के संस्थापक
पंक्चरमैन के संस्थापक

विकास ने बताया, “हमारी सबसे बड़ी चुनौती कियॉस्क में काम करने वाले फिटर को प्रशिक्षित करना था, क्योंकि इन्हीं के भरोसे हम अपने ग्राहकों को बेहतर सेवा देने वाले थे। हर महीने हम लोग एक लाख से ज्यादा ग्राहकों को सेवा मुहैया करा रहे हैं और ये संख्या लगातार बढ़ रही है।”

बाजार और इससे अलग करने वाला

विकास ने बताया, “हमारे लिए सबसे खास बात ये रही कि हमने फॉर्च्यून 500 वाली नवरत्न कंपनी इडियन ऑयल के साथ साझेदारी की, इससे हमें काफी मदद मिली क्योंकि ये उद्योग भी हमारे कारोबार से जुड़ा हुआ है।”

इसके अलावा, सभी पंक्चरमैन कियॉस्क पर स्वचालित मशीनों द्वारा टायर बदले जाते हैं, इससे हथौड़ों के इस्तेमाल को खत्म कर दिया गया। विकास के मुताबिक, 40 फीसदी पंक्चरमैन कियॉस्क चौबीसों घंटे चालू रहते हैं और ज्यादातर सार्वजनिक स्थलों पर हैं, ऐसे में ये महिला चालकों के लिए भी सुरक्षित हैं। विकास बताते हैं, “सड़क किनारे पंक्चर बनाने वाले लोग सिर्फ टायर-ट्यूब की सतह पर पंक्चर को बनाते हैं, जबकि हमारे कियॉस्क पर अंदर से भी मरम्मत की जाती है, जिससे कि अगली बार उसी जगह पर पंक्चर नहीं होती है।”

कियॉस्क पर आरपीएम न्यूमैटिक उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है जिससे बेहतर तरीके से काम होता है। भारत में टायर पंक्चर उद्योग करीब 8 हजार करोड़ का है। आज कई लोग कार और टायर सर्विस क्षेत्र में आने की सोच रहे हैं। इस क्षेत्र की एक और कंपनी चेंजमाईटायर भी टायर सर्विस कारोबार को व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने में जुटी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, आज सिर्फ एक-तिहाई गाड़ियां ही सर्विस के लिए डीलर के पास जाती हैं। बड़ी संख्या में गाड़ियों के मालिक ऐसी दुकान पर जाना पसंद करते हैं जहां पर उन्हें उनकी गाड़ी को हर तरह की सर्विस मिल सके। यहां तक कि टायर रिप्लेसमेंट इंडस्ट्री की कमाई में भी इस साल 11.8 फीसदी का इजाफा देखा गया है। मारुति जैसी ब्रांड ने भी अब चौबीसों घंटे चलने वाली सर्विस सेंटर खोल लिए हैं, जो अब देश भर में मारुति कारों को सड़क किनारे सर्विसिंग देते हैं।

विकास कहते हैं, “हम लोग एक संगठन से जुड़े लोग हैं और हमारा सेल्फ-सस्टेनेबल रेवेन्यू मॉडल है। हमलोग फिलहाल कुल सेवाओं का 25 फीसदी हिस्सा कमाई कर रहे हैं।”

टीम की योजना इस साल के आखिर तक कियॉस्क की संख्या 500 तक करने के साथ ही कारोबार को 50 करोड़ के आसपास पहुंचाने की है। विकास ये कहते हुए खत्म करते हैं, “हम लोग आने वाले समय में अपने प्रति कियॉस्क कमाई बढ़ाने के लिए ओटीसी कॉम्पलीमेंटिंग प्रोडक्ट्स इंट्रोड्यूस करने की योजना बना रहे हैं।”

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