हल्दी, एलोवेरा और लौकी की खेती में है मोटा मुनाफा

जॉब के चक्कर में पड़ने की बजाए घर बैठे करें इनकी खेती, कमाई होगी लाखों में...

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गांव से पलायन उज्ज्वल भविष्य का विकल्प नहीं, न ही यह कोरा उपदेश है। बड़ी-बड़ी नौकरियां छोड़कर अपने घर-गांव में जड़ें जमा रहे युवा आज साबित करने लगे हैं कि सुविधाभोगी जॉब के चक्कर में पड़ने की बजाए, और कुछ नहीं, मामूली मशक्कत से हल्दी, एलोवेरा और लौकी की खेती ही कर ली जाए तो घर बैठे लाखों की कमाई हो सकती है।

सांकेतिक फोटो, साभार: Shutterstock
सांकेतिक फोटो, साभार: Shutterstock
मात्र एक हेक्टेयर में दो-चार सौ लौकी के पौधे लगाकर लाखों की कमाई की जा सकती है। वैसे भी, जब से बाबा रामदेव ने योगा और आयुर्वेद का डंका पीटा है, बाजार में लौकी की बेतहाशा डिमांड बढ़ती जा रही है। दवा कंपनियों से लेकर मधुमेह पीड़ितों तक के लिए इसकी खपत अथाह हो चुकी है। चाहे जितना पैदा करिए, देखते-देखते सारी उपज सेल हो जा रही है।

नौकरी के लिए गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन करना, और उच्च शिक्षा के बावजूद अपनी जड़ों से ही जुड़े रहकर अपने अलावा कई एक और लोगों को भी किसी रोजी-रोजगार से जोड़ लेना, ये सफलता-असफलता की दो अलग-अलग स्थितियां हमेशा से रही हैं। पढ़-लिखकर भी रोजी के लिए शहर-शहर भटकने वाले लाखों युवाओं में बड़ी संख्या उनकी है, जिन्होंने अपने असफल भविष्य का रास्ता उनका खुद का बनाया हुआ है। भैये, एजुकेशन के समय चौबीसो घंटे मोबाइल पर डांस करोगे, फेसबुक पर तैरते रहोगे, हाय-हलो में वक्त बिता दोगे तो तुम्हारे एमए, बीए के जाली सर्टिफिकेट देखकर अपना धंधा चौपट कराने के लिए रोजगार कौन देगा? मां-बाप तो सारे नखरे झेल लिए, निवेशक क्यों बर्दाश्त करे! अपने विवेक, मेहनत और साहस से आज भी तमाम युवा ऐसे हैं, जो अच्छी खासी लाखों के पैकेज वाली नौकरियां छोड़कर बालू में तेल निकाल रहे हैं, अपने हुनर और सफलता से जमाने को चमत्कृत कर रहे हैं और एजुकेशन के समय 'लोलक-लैया' करते रहे यूथ को झाड़ूपोंछा का भी जॉब नहीं मिल पा रहा है। देखिए कि गांवों में प्रतिभाशाली कामयाबी के कैसे झंडे फहराते जा रहे हैं। अरे भैये, कुछ नहीं आता तो कृषि विज्ञानियों से सीख-पढ़कर अपने खेत में लौकी की खेती ही कर लो ना! सब्जियों में ऐसी ऐसी उन्नत प्रजातियां आ गई हैं कि एक-एक बेल में दो-दो सौ लौकियां उपज रही हैं। लौकी की खेती में 3-जी तकनीक जान लें। बताते हैं कि इस तकनीक से एक बेल से सात-आठ सौ लौकियां मिल जाती हैं। 

मात्र एक हेक्टेयर में दो-चार सौ लौकी के पौधे लगाकर लाखों की कमाई की जा सकती है। वैसे भी, जब से बाबा रामदेव ने योगा और आयुर्वेद का डंका पीटा है, बाजार में लौकी की बेतहाशा डिमांड बढ़ती जा रही है। दवा कंपनियों से लेकर मधुमेह पीड़ितों तक के लिए इसकी खपत अथाह हो चुकी है। चाहे जितना पैदा करिए, देखते-देखते सारी उपज सेल हो जा रही है। लौकी की खेती नहीं कर सकते तो, हल्दी की ही कर लीजिए। ये तो वैसे भी व्यावसायिक खेती में शुमार है। पहले तो हल्दी की खेती सिर्फ खरीफ में होती थी, उन्नत प्रजाति एनडीएच-98 की चाहे जहां भी, जिस भी मौसम में खेती की जा सकती है। गुणवत्ता और परिमाण (मात्रा) दोनों में यह अव्वल है। इसके लिए इतना ध्यान रखना जरूरी है कि इसका फसल चक्र न भूलें। 

एनडीएच-98 की खेती अप्रैल मध्य से अगस्त की शुरुआत के बीच होती है। बड़ी आसानी से प्रति हेक्टेयर इसका तीन-चार सौ टन उत्पादन हो जाता है। बाजार-बिक्री की दृष्टि से यह भी बड़े काम की खेती है। दवा और मसाला, दोनो में यह काम आती है। पिछले कुछ सालों से इसके बाजार में लगातार उछाल बना हुआ है। इसी तरह एलोवेरा की खेती की जा सकती है। एक उन्नत किसान ने तो एक ही साल में एलोवेरा की खेती से करोड़ों रुपए कमा लिए। हेल्थ-ब्यूटी-कॉस्मेटिक में आजकल इसकी भारी डिमांड है। मसलन, राजकोट (गुजरात) के हरसुख भाई पटेल को ही ले लीजिए, वह एक एकड़ एलोवेरा में सात लाख रुपए तक कमा ले रहे हैं। आपने दस एकड़ एलोवेरा की खेती कर ली तो समझिए, लगभग एक करोड़ की कमाई पक्की। प्रति किलो सात रुपए तक में एलोवेरा की पत्तियां और तीस रुपए तक में पल्प की बिक्री हो जाती है।

ये बात सही है कि किसान बढ़ती लागत एवं बाजार पर निर्भरता के कारण बड़ी संख्या में खेती छोड़ रहे हैं और आत्महत्या तक करने को मजबूर हैं लेकिन अब ऐसी कृषि पद्धति भी आ गई है कि बार-बार बाजार जाने, उत्पादन घटने, खेत की उर्वरता के मसले आधुनिक उपायों से बहुत आसान हो चुके हैं। बस यूं समझिए कि खेती शून्य लागत पर होने लगी है। बस शुरू में एक देसी गाय पाल लीजिए। खेती के लिए कोई भी संसाधन बीज, खाद, कीटनाशक आदि बाजार से मत लीजिए। खुद घर में तैयार करिए। फसलों के पोषण के सभी आवश्यक सोलह प्रकार के तत्व प्रकृति ने उपलब्ध करा रखे हैं। पौधा अपने पोषण के लिए मिट्टी से सभी तत्व लेता है। फसल के पकने के बाद उसका कूड़ा-करकट मिट्टी में अपघटित हो जाने से मिट्टी की उर्वरता स्वतः लौट आती है। बस इस संबंध में कृषि विशेषज्ञों की संगत कर शून्य लागत पर खेती में मुनाफा ही मुनाफा है। 

अब तो ऐसा वक्त आ गया है कि पूरी दुनिया एक गांव में सिमट गई है। अन्य देशों की कृषि पद्धतियां हमारे देश में अपनाकर आज तमाम युवा मालामाल हो रहे हैं। मसलन, इजराइली विधि से बहुमंजिली इमारतों की दीवारों पर चावल, मक्का, गेहूं की फसलों के अलावा तरह-तरह की सब्जियों की खेती होने लगी है। इस तरह की खेती में वर्टिकल प्लांटिंग सिस्टम के तहत पौधों को स्मॉल मॉड्युलर यूनिट में लगाया जाता है। पौधे बाहर न गिरें, इसकी विशेष ताकीद की जाती है। इस पॉट को गार्डन की डिजाइन में बदलाव लाने या इसे रिफ्रेश करने के लिए निकाला या बदला जा सकता है। प्रत्येक पौधे को कंप्यूटर की सहायता से विशेष पद्धति के जरिए पानी पहुंचाया जाता है। जब इन पौधों पर फसल उगने का समय होता है, पॉट में तैयार हरित दीवारों को कुछ वक्त के लिए नीचे उतार लिया जाता है और उसे जमीन पर क्षैतिज रूप से रख दिया जाता है। यह कृषि पद्धति ये सीख देती है कि हम कैसे सिर्फ जमीन ही नहीं, भवन की दीवारों तक को अपनी आय का सोर्स बना सकते हैं। एलोवेरा की तरह आजकल के तमाम युवा मशरूम की खेती में अपनी किस्मत आजमा कर मालदार हो रहे हैं।

खासकर, पर्याप्त मिनरल्स और विटामिन वाले 'बटन' मशरूम की खेती अब कई एक प्रदेशों में होने लगी हैं। अक्‍टूबर-नवंबर में इसकी फसल लगाई जाती है। प्रति‍ वर्ग मीटर इससे 10 कि‍लो तक उपज मिल जाती है और आराम से यह साढ़े तीन सौ रुपए किलो तक शहरों में बिक रहा है। इस सम्बंध में कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केंद्रों से विस्तृत जानकारी और प्रशिक्षण लेकर यह उन्नत और अकूत मुनाफे वाली खेती का बड़ा विकल्प हो सकती है।

गांव अब पहले जैसे नहीं रहे। जो लोग वहां से पलायन कर रहे हैं, उनकी असफलता की वजहें कुछ और हो सकती हैं वरना आज ग्रामीण क्षेत्रों में तमाम तरह की बेहतर संभावनाएं रंग लाने लगी हैं। और कुछ नहीं तो वैज्ञानिक विधि से चारा उगाइए और साथ में मात्र एक-दो दुधारू पशु पालकर रोजाना हजारों रुपए की कमाई कर सकते हैं। चारे की खेती की हाइड्रोपोनिक्स विधि आ गई है। यह मामूली सिंचाई से तैयार हो जाता है। कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि परंपरागत चारे की तुलना में हाइड्रोपोनिक्स विधि से तैयार चारे में पौष्टिक तत्वों की मात्रा बहुत अधिक होती है। खेती में कामयाबी के लिए तरह-तरह के संसाधन भी उपलब्ध होने लगे हैं। मसलन, आज इंटरनेट के जमाने में ऐप का खेती-बाड़ी में इस्तेमाल, घर बैठे सारी जानकारी आपके पास कि कौन सी खेती मुनाफेदार है, फसल की कहां-कहां बिक्री कर अच्छी कमाई की जा सकती है, ज्यादा उपज के लिए क्या करना होगा, आदि। ऐप से तो अब पलक झपकते खेत की पैमाइश तक के उपाय आ गए हैं। जानकारी न रखने वालों के लिए ये सूचनाएं जादू जैसी लग सकती हैं। 

इसी तरह आवारा पशुओं से फसल बचाने के नए-नए उपाय भी कृषि वैज्ञानिकों ने सुझा दिए हैं। गोमूत्र, मट्ठा और लालमिर्च का घोल खेत के आसपास छिड़क देने से वहां एक महीने तक जंगली जानवर फटकते तक नहीं हैं। फसली खेतों के मेड़ों के किनारे-किनारे करौंदा, जेट्रोफा, तुलसी, खस, जिरेनियम, मेंथा, एलेमन ग्रास, सिट्रोनेला आदि रोप कर उपज को सुरक्षित किया जा सकता है। एक लीटर पानी में एक ढक्कन फिनाइल के घोल का छिड़काव भी फसलों की रक्षा करता है। गांव में रहते हुए इंटरनेट की मदद से कृषि में और भी कई आधुनिक सुविधाओं, सरकारी संसाधनों, व्यावसायिक सरोकारों का लाभ लिया जा सकता है। 

अकेले कुछ कर पाने का रिस्क नहीं लेना चाहते हैं तो कैलिफोर्निया रिटर्न मांडया (बेंगलुरु) के आईटी प्रोफेशनल मधुचंद्रन चिक्कादैवेया से सीख ले सकते हैं कि वह किस तरह अपने वतन लौटकर आज आर्गेनिक फल-सब्जियां बेच रहे हैं। वही बता सकते हैं कि आखिर किस तरह उन्होंने तीन-चार महीने में एक करोड़ का बिजनेस कर लिया।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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