माइकल जैक्सन के डांस से यातायात को संभालता है इंदौर शहर का यह दबंग पुलिस वाला  

इस वक्त शाम के 7 बजे हैं। पुराने इंदौर शहर में बना ट्रैफिक पुलिस का मुख्यालय दूसरे आम दिनों की तरह सामान्य और शांत है, लेकिन वहां रखे कुछ वॉकी टॉकी के घनघनाने की आवाज़ होती है। वहीं वातावरण में इस लम्बी गर्मी में शाम को थोड़ा ठंडी हवा चलने से राहत महसूस हो रही है। तभी हम देखते हैं कि एक पुलिस वाला ट्रैफिक को बिल्कुल अलग अंदाज़ में कंट्रोल कर रहा है। वो पुलिस वाला फिल्मी स्टाइल में नाच कर ट्रैफिक को बड़े आराम से संचालित कर रहा है मानो वो सिंघम और दबंग का कोई हीरो हो। कोई भी उसका नाम नहीं जानता, लेकिन सब उसके काम को जानते हैं कि जब तक वो है यहां पर कोई गड़बड़ नहीं होने वाली।

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उनको हमारी परवाह नहीं है

इंदौर शहर में किसी दिन जब आप हाई कोर्ट के पास से गुज़रते हैं तो आप देखते हैं कि वहां पर भारी यातायात को कैसे एक आदमी माइकल जैक्सन की तरह डांस करते हुए बड़ी आसानी से संभाल रहा है। इस इंसान को लोग कई नामों से पुकारते हैं। देश भर में ऐसे काम से नाम कमाने वाले बहुत कम लोग हैं।इस आदमी का असली नाम रंजीत सिंह है। देश भर में जहां ट्रैफिक पुलिस कर्मियों को सम्मान की नजरों से नहीं देखा जाता, वहीं रंजीत सिंह ने बताया है कि किसी भी काम की महत्ता उसके काम से होती है दूसरे तरीके से नहीं।

वो कहते हैं कि “मैं अपने काम में 100 प्रतिशत देने की कोशिश करता हूं। मैं इस बात की परवाह नहीं करता हूं कि ट्रैफिक नियमों को तोड़ने वाला कौन है? मैंने एक बार एसपी और एक बार अपने पिता को भी सड़क पर रोक दिया था। हालांकि बाद मुझे काफी कुछ सुनना पड़ा था।”

इस बात पर बहस नहीं हो सकती कि उनकी एक आकर्षक छवि है। बावजूद इसके उनकी हास्यवृति और जीवंत भावना उनको दूसरों से अलग करती है। वो बताते हैं कि ज्यादातर बातचीत वो हिंदी में करना पसंद करते हैं, लेकिन जरूरत पड़े तो अंग्रेज़ी में भी अपनी बात समझाने से पीछे नहीं हटते। यही वजह है कि उनको कई संस्थान अपने यहाँ बातचीत के लिए आमंत्रित करते हैं। उनके अनूठे काम को देखते हुए मध्य प्रदेश पुलिस विभाग के साथ शहर के कई निजी संगठन उनको सम्मानित कर चुके हैं।

वो बताते हैं कि “जब मैं पुलिस बल में शामिल हुआ तो ईमानदारी से ट्रैफिक संभालना शुरू कर दिया था। भले ही 45 डिग्री का तापमान हो या फिर मॉनसून हो। लोग कहते थे कि नया जोश है तीन चार महीने में ठंडा हो जायेगा। आज मुझे 9 साल हो गये हैं और मैं यहीं पर हूं।”

शुरूआत में जब वो सड़क पर डांस करते थे तो लोग उनको सनकी कहते थे, लेकिन जल्द ही उनको समझ में आ गया कि ये कठिन काम है। यही वजह है कि आज जब भी वो ड्यूटी पर होते हैं तो सिंग्नल क्रास करने से पहले कोई भी दो बार सोचता है। इतने सालों में रंजीत को दूर दराज़ के लोग भी पहचाने लगे हैं। सोशल मीडिया में उनके कई चाहने वाले हैं। यहां तक कई युवा उनसे अपने करियर और दूसरी चीजों के बारे में राय मांगते हैं। उनका कहना है कि “काफी लोगों का कहना है कि जब वो नियम तोड़ते हैं तो मैं उनके साथ दुर्व्यवहार करता हूं। इसलिये कुछ लोग हमें भ्रष्ट भी समझते हैं। वहीं दूसरी ओर जब आप पुलिस वालों को भ्रष्ट कहते हो क्योंकि वो घूस लेते हैं, तो उन लोगों को क्या कहेंगे जो चलान से बचने के लिए घूस देने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों से मैं कहता हूं तुम पढ़े लिखे गंवार हो। तुमने भले ही कितनी डिग्रीयाँ हासिल कर ली हो, लेकिन तुम्हारा व्यवहार निम्न स्तर का है।”यही नहीं उनका कहना है कि “जो लोग मेरे से जैसे बात करते हैं, मैं वैसे ही उन लोगों से बात करता हूं। अगर कोई मेरे नाम से मुझे बुलाते हैं और बेइज्ज़ती करते हैं तो मैं भी उनके साथ वैसा ही व्यवहार करता हूं।” उनका मानना है कि इस तरीके से नियम तोड़ने वालों से सम्मान हासिल किया जा सकता है।

जिस तरह आप मुझे महसूस कराते हैं

साल, 2008 में वो एक यातायात क्रासिंग पर खड़े थे तभी उनको एक कार ने टक्कर मार दी। रंजीत का कहना है कि “उस वक्त बारिश हो रही थी और कार ड्रॉइवर मुझे देख नहीं पाया था।”उन्होने ड्राइवर को माफ़ कर दिया, लेकिन गंभीर चोट के कारण वो खुद तीन महीने तक बिस्तर पर पड़े रहे। इसके बाद उनका ट्रांसफर डेस्क के काम में कर दिया। जहां पर वो फाइलों में उलझे रहते और मेमो जारी करने का काम करते थे। उनका कहना है कि“ये मेरी जिंदगी का सबसे बुरा वक्त था और मैं इस सब से बेहद नाखुश था। यातायात क्रॉसिंग मेरा दिल था। वो मेरे लिये बना है। जो चीज मुझे जिंदगी से चाहिए थी, मुझे रोड पर मिल गई थी।” वो यातायात क्रॉसिंग को अपनी कर्मभूमि मानते हैं। जहां पर वो लोगों के सामने डांस कर सकते थे और ये उनके लिए किसी हीरो की तरह जीने के एक सपने की तरह था।

दुनिया में कुछ ही लोग हैं, जो अपनी जिंदगी में जिस काम से प्यार करते हैं उसी को वो कर पाते हैं, लेकिन दुर्घटना के बाद मेरे लिए इस बात की संभावना कम थी कि मैं अपनी नौकरी से मिलने वाली खुशी को दोबारा हासिल कर सकूँ।

साल 2010 के आसपास पुलिस विभाग ने जब शहर की ऐसे जगहों का सर्वेक्षण किया, जहां पर यातायात की स्थिति बेहद गंभीर थी। उस वक्त एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को रंजीत का ख्याल आया कि वो कैसे भीड़भाड़ वाले यातायात को भी आसानी से संभाल लेते थे। जिसके बाद उन्होने रंजीत से कहा कि वो एक बार फिर सड़क पर उतरें। “ये सुनकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा, हालांकि उस वक्त मेरे पैर की उंगलियों में चोट ठीक नहीं हुई थी, लेकिन मुझे उस फैसले का कोई पछतावा नहीं था और मैं सड़क पर अपने काम में जुट गया।”

आइने में इंसान

संयोग से ये वो सड़क थी जब 18 साल की उम्र में वो घर से भागकर इस सड़क के आसपास रहने लगे थे। रंजीत का कहना है कि “मेरे पिता अक्सर मुझे मारा करते थे, वो पुलिस में कांस्टेबल थे। दिन भर की मेहनत के बाद जब वो घर लौटते थे तो उस दौरान कई बार वो शराब पीकर आते थे। वो इस बात को बर्दाश्त नहीं कर पाये कि मैं परीक्षा में फेल हो गया था। मैं उनको कभी खुश नहीं रख सका, हालांकि मैं चाहता था कि वो मुझ पर गर्व करें।” तीन भाइयों में सबसे बड़ा होने के कारण रंजीत के सामने चुनौती थी कि वो अपने भाइयों को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाएँ। “लेकिन मैं इस काम में बुरी तरह नाकाम रहा जब मैं 12वीं की परीक्षा पास नहीं कर पाया। तब मैंने घर छोड़ने का फैसला लिया।” वो झबुआ से इंदौर अपनी आंटी के पास आ गये। जहां वो अपने परिवार के साथ रहती थीं।

रंजीत को इस बात का यकीन था कि उसके पिता उस पर एक ना एक दिन जरूर गर्व करेंगे। रंजीत ने यातायात पुलिस विभाग में नौकरी शुरू कर दी। “मैं एक अच्छा खिलाड़ी था और बाद में अच्छा कैडेट बन गया। आज मैं अपने पिता की आंखों में गर्व महसूस करता हूं, इस बात से मुझे काफी संतुष्टि मिलती है।”

शायद ये उनकी अपने अंदर प्रेरणा है कि मुश्किल मौसम और हालात में भी वो आठ से दस घंटे सीटी बजाकर यातायात को नियंत्रित करते हैं। बदले में महीने के अंत में उनको जो मिलता है वो काफी कम होता है। यातायात कर्मी को करीब 16 हजार रुपये से लेकर 20 हजार रुपये तक ही मिलते हैं।

स्वास्थ्य पर जोर

“जब मैं अपने घर लौटता है तो विश्वास की जिए कि कुछ घंटों तक किसी से बात तक नहीं करता उस वक्त मेरा साथी सिर्फ बिस्तर होता है।”बावजूद इसके ना सिर्फ रंजीत अपने शरीर पर नियमित ध्यान देते हैं बल्कि अपनी सहनशक्ति को भी बनाये रखते हैं। “ये काम पूरी तरह शारीरिक तौर पर जुड़ा हुआ है और मेरी उम्र जहां बढ़ रही है वहीं मेरी सहन-शक्ति कम हो रही है। आज मैं 38 साल का हूं। ऐसे में कोई नया यातायात कर्मी मेरे से पूछता है कि उसे कैसे और क्या करना है तो मैं उसको ताकत और सहनशक्ति बनाये रखने के लिए कहता हूं।” हालांकि कुछ प्रोडक्शन हाउस ने रंजीत से एनर्जी ड्रिंक बनाने वाले ब्रांड के लिये विज्ञापन करने को कहा लेकिन उन्होने इसके लिये इंकार कर दिया उनका कहना था कि ऐसा करने से उनकी नौकरी जा सकती है।

रंजीत के माता-पिता 
रंजीत के माता-पिता 
रंजीत का दिन सुबह साढ़े पांच बजे से शुरू होता है। सबसे पहले वो योग और उसके बाद जिम जाते हैं। नाश्ते में वो दो केले या एक सेब लेते हैं। आज वो शादीशुदा हैं और उनके दो बच्चे हैं, बवाजूद इसके रंजीत अपनी निजी जिंदगी के बारे में ज्यादा बात करना पसंद नहीं करते। “मैंने अपनी जिंदगी में प्यार में धोखा खाया है, मैंने फैसला लिया है कि मैं अपना जीवन देश की सेवा में लगा दूँगा।”

कई ईर्ष्यालु सहयोगियों के बावजूद रंजीत अपने विभाग के साथी युवा लोगों को प्रेरित करते रहते हैं। इनमें से चार उनके स्टाइल को यातायात नियंत्रित करने के लिये उनकी शैली की नकल करते हैं। रंजीत के मुताबिक “मेरी जिंदगी में अहम मोड़ तब आया जब एक बूढ़ा और ग़रीब ठेलेवाला जिस चौराहे पर मैं खड़ा होता था वहां से रोज़ गुजरता था तब मैं उसकी कई बार भार उठाने में मदद भी करता था। एक दिन वो मेरे पास आया और मुझे 10 रुपये थमाते हुए बोला कि वो इन पैसों को मंदिर में दान देना चाहता था लेकिन उसके भगवान तो यहीं पर हैं। मैं आज भी वो नोट अपने साथ लेकर चलता हूं।” इसी तरह वहां पर एक दृष्टिहीन महिला हर शाम साढ़े चार बजे उस चौराहे पर आती थी और रंजीत का नाम पुकारती थी ताकि वो उसको सड़क पार करा दे। रंजीत का कहना है कि “अगर कभी मैं वहां पर मौजूद नहीं होता था तो मेरी जगह तैनात दूसरे सहकर्मी को उस महिला की मदद करने को कहता था।” इतना ही नहीं रंजीत अब तक सड़क हादसे में 50 से ज्यादा लोगों अस्पताल पहुंचा चुके हैं।

काला या सफेद

रंजीत के मोबाइल पर लगातार घंटती बजती है, इस वजह से बातचीत में खलल पड़ता है। रंजीत मुझे बताते हैं कि “ये मेरे कोच का फोन है मैं पीएससी परीक्षा की तैयारी जो कर रहा हूं।”उन्होने अपने हाथ में जो काले रंग का बैंड जो अपने हाथ में पहना होता है उसे वो हटा देते हैं। “देखिये ये मेरा असली रंग है, जब मैं नहाता हूं तो पूरा काला पानी बहता है। दिन के अंत में ये मुझे डरावना लगता है क्योंकि मैं भी एक आम इंसान ही हूं।”लेकिन अगले ही पल वो अपना बाजूबंद दिखाते हैं और बताते हैं कि “ये मेरे चचेरे भाई का है जो करगिल की लड़ाई में शहीद हो गया था। उसे चार गोलियां लगीं थीं। जो बताती हैं कि वो अंत तक कितनी बहादुरी से लड़ा होगा। मैंने अपनी भाभी से कहा कि मुझे उसका बैंड दे दो ताकि जब भी मैं कमजोर पडूं तो ये मेरे जीवन के उद्देश्य की याद दिलाता रहे।” इसके बाद झट से रंजीत एक शेर सुनाते हैं “इस इत्र से कपड़ों को महकाना बड़ी बात नहीं, मजा तो तब है जब मेरे किरदार से खुशबू आये।” इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये की रंजीत दिल से कवि हैं। इस बात की पूरी संभावना है कि हमारे साथ लंबी बातचीत की वजह से उनको अपनी क्लास छोड़नी पड़ी हो और 12 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद वो अपने घर चले गये हों। वो कल फिर आएँगे, नई ऊर्जा और कुछ नये डांस स्टेप के साथ ताकि यातायात को नियंत्रित करने के साथ सड़कों पर लोगों के गुस्से को थोड़ा शांत कर सकें।  

मूल - दीप्ति नायर

अनुवाद- गीता बिष्ट 

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