इस भारतीय महिला डॉक्टर के बलिदान ने बदल दिया आयरलैंड का कानून

0

भारतीय मूल की दंत चिकित्सक डॉ सविता हलप्पनवार के बलिदान ने जनमत संग्रह के जरिए आयरलैंड का वह ऐतिहासिक कानून पलट दिया है, जिसमें महिलाओं को इस कैथोलिक देश में गर्भपात कराने की इजाजत नहीं थी। अब ये प्रतिबंध खत्म हो चुका है। जनमत संग्रह के दौरान 66.4 प्रतिशत लोगों ने प्रतिबंध खत्म करने और 33.6 फीसदी ने इसके विरोध में मतदान किया। सविता के पिता आनंदप्पा यालगी ने कहा है कि उन्हें आशा है, आयरिश लोग उनकी बेटी को याद रखेंगे।

सविता हलप्पनवार
सविता हलप्पनवार
इस बैन को खत्‍म करने के पक्ष में डबलिन की सड़कों पर लोग कैंपेन के स्‍लोगन के साथ टी-शर्ट पहनकर मार्च करते रहे हैं। अब इस कानून में बदलाव के लिए पहली बाधा (जनमत) पार करने के बाद आयरिश सरकार प्रस्ताव को कैबिनेट में मंजूरी के लिए सदन में प्रस्तुत करेगी।

आयरलैंड यूरोप का कैथोलिक देश है। आयरलैंड के प्रधानमंत्री लियो वरदकर भारतवंशी हैं। वह कहते हैं कि देश ने इतिहास रच दिया है। गर्भपात कानून लचीला बनाने के मुद्दे पर हुए जनमत संग्रह से साबित हो चुका है कि इसके पक्ष में जबरदस्त जीत सामने आई है। इस देश में आयरिश कानून 'ऑफेंश अगेंस्ट द पर्सन एक्ट 1861' के मुताबिक गर्भ खत्‍म करने पर 14 वर्ष तक की सजा का प्रावधान रहा है। वर्ष 1983 से अब तक यहां की 1, 70, 000 महिलाएं गर्भपात के लिए विदेश जा चुकी हैं। वर्ष 1983 में आयरिश कानून में आठवें संशोधन के मुताबिक गर्भपात कराने पर सजा का प्रावधान किया गया था।

इस बैन को खत्‍म करने के पक्ष में डबलिन की सड़कों पर लोग कैंपेन के स्‍लोगन के साथ टी-शर्ट पहनकर मार्च करते रहे हैं। अब इस कानून में बदलाव के लिए पहली बाधा (जनमत) पार करने के बाद आयरिश सरकार प्रस्ताव को कैबिनेट में मंजूरी के लिए सदन में प्रस्तुत करेगी। आयरलैंड के स्वास्थ्य मंत्री सिमोन हैरिस ने बताया है कि 29 मई 2018 को कानून में बदलाव के प्रस्ताव की मंजूरी के लिए कैबिनेट के सामने पेश किया जाएगा। नए कानून के मुताबिक अब आयरलैंड में भी महिलाएं गर्भपात करा सकेंगी। अब प्रतिबंध खत्म हो चुका है। जनमत संग्रह के दौरान देश के 40 निर्वाचन क्षेत्रों के कुल 63.9 फीसदी लोगों ने मतदान किया। उनमें 66.4 प्रतिशत लोगों ने गर्भपात पर लगा प्रतिबंध खत्म करने के पक्ष में और 33.6 फीसदी लोगों ने बैन लगे रहने के समर्थन में मतदान किया।

डबलिन कैसल में भारतीय समयानुसार रात करीब 10: 52 बजे आधिकारिक रूप से नतीजों को ऐलान किया गया। गर्भपात की मंजूरी संबंधी जनादेश की घोषणा होते ही लोगों ने सविता-सविता के नारे लगाए। प्रधानमंत्री ने कहा कि लोगों ने अपनी राय जाहिर कर दी है। एक आधुनिक देश के लिए एक आधुनिक संविधान की जरूरत है। आयरलैंड के मतदाता, महिलाओं के सही निर्णय लेने और अपने स्वास्थ्य के संबंध में सही फैसला करने के लिए उनका सम्मान और उन पर यकीन करते हैं। हमने जो देखा वह आयरलैंड में पिछले 20 सालों से हो रही शांत क्रांति की पराकाष्ठा है। आठवें संशोधन को निरस्त करने के पक्ष में पड़े मत कानून में बदलाव के लिए आयरलैंड की संसद का मार्ग प्रशस्त करते हैं। सविता हलप्पनवार के पिता आनंदप्पा यालगी ने कर्नाटक स्थित अपने घर से कहा कि उन्हें आशा है, आयरिश लोग उनकी बेटी को याद रखेंगे।

वर्ष 2013 में सविता की मौत के मामले की तहकीकात उस वक्त पूरी हुई थी, जब एक ज्यूरी ने एकमत से फैसला सुनाया कि उनकी मौत चिकित्सीय दुर्घटना के कारण हुई है। यहां के गैलवे कोर्टहाउस में दिए गए इस फैसले में कहा गया कि 31 वर्षीय दिवंगत सविता की देखभाल में कमियां थीं या देखभाल की व्यवस्था विफल रही थी। जांच अधिकारी डॉ कियार्न मैकलोग्लीन ने सविता के पति प्रवीण हलप्पनवार से कहा था कि आपने अपनी पत्नी के लिए बेमिसाल प्यार और श्रद्धा दिखाई। पूरे आयरलैंड की निगाह इस मामले पर थी। मेडिकल काउंसिल को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कब एक डॉक्टर किसी मां की जिंदगी बचाने के लिए हस्तक्षेप कर सकता है, जिससे डॉक्टर के दिमाग से संदेह और डर दूर हो सके।

फैसला सुनाने वाली ज्यूरी ने कियार्न द्वारा की गई सभी 9 सिफारिशें भी मंजूर कर ली थीं। यहां के गैलवे यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के चिकित्सकों ने ही स्थानीय कानून का हवाला देकर उनका गर्भपात करने से इनकार कर दिया था। उस वक्त चिकित्सकों ने सविता के पति से कहा था कि भ्रूण में धड़कन मौजूद है। आयरलैंड एक कैथोलिक देश है। ऐसी स्थितियों में हमारे देश में गर्भपात नहीं किया जा सकता है। जांच रिपोर्ट में बताया गया कि सविता की जांन बच सकती थी अगर अस्पतालकर्मियों ने भ्रूण को बचाने पर ‘ज्यादा जोर’ और उनके गिरते स्वास्थ्य पर ‘कम जोर’ नहीं दिया होता। तभी से यहां के ज्यादातर मतदाताओं का विचार रहा है कि गर्भपात संबंधी कड़े कानून को लचीला बनाना चाहिए।

यहां भारतीय मूल की 31 वर्षीय दंत चिकित्सक सविता हलप्पनावर का छह साल पहले मिसकैरिएज हो गया था। कड़े कैथोलिक कानून के चलते उन्हें गर्भपात की मंजूरी नहीं मिली थी। इस वजह से उनकी मौत हो गई थी। इसके बाद ही मां की जिंदगी पर जोखिम होने पर गर्भपात की मंजूरी के लिए 2013 में इस कानून में किंचित बदलाव किया गया। यह संशोधन बताता है कि 'अजन्‍मे बच्‍चे को भी मां की ही तरह जीने का अधिकार है।'

सविता हलप्पनवार को उनके पति प्रवीण ने 21 अक्तूबर 2012 को पेट में दर्द होने की शिकायत पर डबलिन के गैलवे यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में भर्ती कराया था। उस समय उनके गर्भ में 17 सप्ताह का भ्रूण पल रहा था। डॉक्टरों ने गर्भपात की सलाह दी। आयरिश कानून का भी हवाला दिया गया, जिसके मुताबिक कुछ निर्धारित परिस्थितियों में गर्भपात संभव है। इसी दौरान सविता की हालत बिगड़ गई और 28 अक्टूबर 2012 को उनकी मौत हो गई। सविता की मौत और यूरोपीय मानवाधिकार समझौते के तहत भ्रूण के विकृत होने पर गर्भपात की इजाजत दी गई। सविता हलप्‍पानार की मौत के बाद से ही गर्भपात के कानूनों और बैन पर बहस शुरू हो गई थी।

गर्भपात पर पाबंदी हटाने का जन-अभियान आयरिश टाइम्‍स पोल की 'यस' मुहिम का हिस्‍सा रहा है। मुहिम के दौरान 68 प्रतिशत लोग बैन खत्‍म करने और 32 प्रतिशत लोग यह कानून बने रहने के पक्ष में रहे। यहां के नेशनल ब्रॉडकास्‍टर आरटीई की ओर से कराए गए एक और पोल में 69 प्रतिशत लोग बैन खत्‍म करने और 30 प्रतिशत लोग इस कानून के समर्थन में रहे। इस दौरान सविता हलप्पनवार ही आयरलैंड में गर्भपात पर पाबंदी के खिलाफ छिड़ी मुहिम का मुख्‍य चेहरा बनकर उभरी थीं। वर्ष 2012 में जब सविता को पता लगा कि उनके गर्भ में ही उनका बच्‍चा मर गया है तो उन्‍होंने अपनी प्रेग्‍नेंसी को टर्मिनेट कराना चाहा था लेकिन उनके अनुरोध को आयरलैंड के कड़े कानूनों की वजह से खारिज कर दिया गया था। इसके बाद ज्‍यादा खून बह जाने की वजह से वह चल बसी थीं।

यह भी पढ़ें: मुंबई पुलिस ने चंदा इकट्ठा कर 65 साल की बेसहारा महिला को दिलाया आसरा

यदि आपके पास है कोई दिलचस्प कहानी या फिर कोई ऐसी कहानी जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो आप हमें लिख भेजें editor_hindi@yourstory.com पर। साथ ही सकारात्मक, दिलचस्प और प्रेरणात्मक कहानियों के लिए हमसे फेसबुक और ट्विटर पर भी जुड़ें...

पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

Related Stories

Stories by जय प्रकाश जय