देहरी के भीतर का दर्द!

घर के भीतर का वो दर्द जो खत्म होने का नाम नहीं लेता...

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 एक गैर सरकारी संस्था के मुताबिक, भारत में लगभग पांच करोड़ महिलाओं को अपने घर में ही हिंसा का सामना करना पड़ता है। इनमें से मात्र 0.1 प्रतिशत ही हिंसा के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने आगे आती हैं।

 सांकेतिक तस्वीर
 सांकेतिक तस्वीर
महिलाओं को अधिक विकल्प देने की ओर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। यही कारण है तमाम कानून के बावजूद डेहरी के अन्दर का बाघ, बकरी का आखेट करता आ रहा है।

त्रासदी है कि हिंसा भी अब घरेलू होने लगी है। आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी आज स्त्री घर की चारदीवारी में भी सुरक्षित नहीं है, अब घर पति गृह में बदलने लगे हैं। 

बन्द दरवाजों के पीछे की इस पार्श्विकता से मुक्ति का मार्ग नहीं मिल पा रहा है। कानून चश्मदीद गवाह चाहता है। सबूत मांगता है। घरेलू हिंसा औरत का कद छोटा कर देती है। जिसे घर में इज्जत नहीं मिली, उसे बाहर कौन सम्मान देगा? वह मिटती-पिटती रहती है किन्तु अत्याचारों का धुआं तक बाहर निकलने नहीं देता है। दरअसल भारत में अब भी महिलाओं के लिए शादी को ही एकमात्र विकल्प देखना जारी है। जब भी कोई समस्या आती है तो उनके पास दो ही विकल्प होते हैं, या तो सहते हुए शादी बरकरार रखें या फिर अपनी जान दे दें। महिलाओं को अधिक विकल्प देने की ओर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। यही कारण है तमाम कानून के बावजूद डेहरी के अन्दर का बाघ, बकरी का आखेट करता आ रहा है।

जख्मी चेहरा, व्यथित मन, दर्द से कराहती देह, असुरक्षित भविष्य, टूटते ख्वाब, दरकता सम्बन्ध, अरुचिकर जीवन और अवसादित जीवन शैली, फिर भी जीवन जीने की मजबूरी। सात दशकों से यही दास्तान है पति और परिवार द्वारा शारीरिक और प्रताड़ित स्त्री की। भारतीय कानून ने इस सारी संवेदनहीनता, वेदना और त्रासदी को समेट कर संक्षेप में 'घरेलू हिंसा' का नाम दिया है। त्रासदी है कि हिंसा भी अब घरेलू होने लगी है। आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी आज स्त्री घर की चारदीवारी में भी सुरक्षित नहीं है, अब घर पति गृह में बदलने लगे हैं। पति गृह बन्दी गृह के समान है, जहां अधीक्षक की भूमिका सात जन्मों के जीवन साथी पति ने लेनी शुरू कर दी है।

संयुक्त राष्ट्र की महिला इकाई के अध्ययन के अनुसार 37 प्रतिशत भारतीय महिलायें घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। अपने ही जीवन साथी के द्वारा प्रताड़ित की जाती हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्डस ब्यूरो के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 2003 में घरेलू हिंसा सम्बन्धी दर्ज मामलों की संख्या 50,703 थी जो 2013 में बढ़कर 118,866 हो गई, यानी दस सालों में इसमें 134 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। एक गैर सरकारी संस्था के मुताबिक, भारत में लगभग पांच करोड़ महिलाओं को अपने घर में ही हिंसा का सामना करना पड़ता है। इनमें से मात्र 0.1 प्रतिशत ही हिंसा के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने आगे आती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण भारत सरकार के आंकड़ें इस सम्बन्ध में बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट पेश करते हैं। ये रिपोर्ट बताती है कि भारत में अशिक्षित महिलाओं की तुलना में पढ़ी-लिखी महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार ज्यादा होती हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, ज्यादा पढ़ी-लिखी महिलाओं को अपने पति से घरेलू हिंसा का खतरा कम पढ़ी-लिखी की तुलना में 1.54 गुना ज़्यादा होता है। इसके अलावा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट ये भी बताती है कि भारत में करीब 37 प्रतिशत महिलाएं अपने पतियों की वजह से घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं। 

समाज के हर वर्ग की स्त्री घरेलू हिंसा की शिकार है। 'घरेलू हिंसा' नारी समुदाय में भारतीय एकता का प्रतीक है। इक्कीसवीं सदी के प्रगतिशील समाज में इस प्रकार की सामाजिक बुराई की व्यापकता समाजशास्त्रीय विवेचना के लिये चुनौती है। प्रथम दृष्टया घरेलू पृष्ठभूमि, नशाखोरी, आजीविका की असुरक्षा, अशिक्षा एवं संकीर्णता आदि प्रमुख कारक प्रतीत होते हैं किन्तु सबसे बड़ा कारण है, सनातन काल से चली आ रही पुरुष की आधिपत्यवादी दृष्टि। जो संस्कार बन कर समाज का सहज व्यवहार बन गई है। सीता का रावण द्वारा हरण हो अथवा राम के द्वारा सीता की अग्नि परीक्षा, द्रौपदी का 'बंटवारा हो या दुनिया को समता का संदेश देने वाले इस्लाम द्वारा औरत को बुर्के में कैद करना, सभी पुरुष आधिपत्यवाद के द्योतक हैं।

युग बदलता रहा, किरदार बदलते रहे लेकिन स्त्री की स्थिति यथावत रही। जब भी कोई युद्ध हुआ स्त्री और बच्चियां भी साजो समान के साथ लूटी गयी। औरत की जांघों के ऊपर से दुश्मन फौज फ्लैग मार्च करती हुयी निकल जाती है। स्त्री 'वसुन्धरा' है। पुरुष 'वीर है। अत: स्त्री भोग की वस्तु है, पुरुष द्वारा भोगा जाना ही उसकी नियति है। अत: यह बाजारों में बिकती है, चौराहों पर नचवायी जाती है। ये 'बेइज्जत चीज बड़ी आसानी से इज्जतदारों में बांट दी जाती है। शनै: शनै: यह प्रवृत्ति समाज के संस्कार में शामिल हो गयी है। घर जिसे दाम्पत्य जीवन में मन्दिर का स्थान प्राप्त है, उसमें स्त्री अपने 'आराध्य पति परमेश्वर' के द्वारा हिंसा की शिकार हो रही है। शराबी पुरुष द्वारा इस प्रकार की घटनाये बहुतायत संख्या में प्रकाश में आ रही है। घरेलू हिंसा नारी उत्पीडऩ का घोर पाश्विक रूप है। बाघ और बकरी सी स्थिति है।

निर्धन परिवार की कमला कई घरों में झाड़ू-पोछा कर अपने परिवार का भरण-पोषण करती है। घर पहुंचने पर बच्चे खाना और पति शराब के लिये पैसे मांगता है, पैसा देने या आनाकानी करने पर कमला का पीटा जाना नियम सा बन गया है और कमला ने भी स्वयं के साथ हो रही हिंसा को अपना भाग्य मान लिया है।

कमोवेश निम्न वर्गीय समाज मे घरेलू हिंसा की यही स्थिति है, कमला और उसका पति उस समाज के प्रतिनिधि किरदार हैं और विडम्बना यह है कि यह किरदार पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी प्रासंगिकता बरकार रखे है। मध्य वर्गीय समाज की भी महिलाओं के प्रति हिंसा लगातार बढ़ रही है। पहले तो स्त्री को प्रतिष्ठता व सम्मान के नाम की दुहाई देकर आर्थिक रुप से पंगु बना दिया, स्त्री का महोताज बन जाने के बाद, स्त्री और पुरुष के मध्य दाता और याचक की स्थिति बन गयी। समाज में दाता की स्थिति याचक से अधिक सुदृण होती है। अत: पुरुष सदैव मनोवैज्ञानिक लाभ की स्थिति में होता है। अपनी 'आश्रिता से आश्रयदाता' की अपेक्षायें भी भिन्न प्रकार की होने लगती हैं। यह 'भिन्नात्मक अपेक्षाओं की पूर्ति में बाधा', उसके अहम् को झंकृत कर देती हैं। मन में बैठा 'पशु जिसे अब 'पौरुष के पर्याय के रूप में स्वीकार कर लिया गया है, जागृत होकर, 'अर्धांगिनी, भार्या, धर्मपत्नी की भाव धारा को क्रूर प्रहारों से लहूलुहान कर देता है। शरीर से अधिक मन पर असर करते हैं ऐसे प्रहार। इस प्रकार की 'घरेलू हिंसा से ग्रसित होने पर स्त्री स्वयं को निराश्रित महसूस करती है। अन्तर्मन की वेदना आंसुओं के स्वरूप में ढलकर सिसकियों की गुहार के साथ बह निकलती हैं। मानो विधाता से कह रही हो कि स्त्री के साथ यह भेदभाव क्यों?

इस घरेलू हिंसा में अपशब्द, मार-पीट और भावनात्मक प्रताडऩा के साथ-साथ यौन हिंसा का कृत्य भी समावेशित है। संयुक्त राष्ट्र की रपट के अनुसार भारत के संस्कृतिनिष्ठ समाज में 48 फीसदी स्त्रियों को अपने ही जीवन साथी द्वारा यौन हिंसा का शिकार होना पड़ता है। गृहस्थ जीवन की स्थापना में अनेक उद्देश्यों के साथ-साथ उन्मुक्त यौनाचार के स्थान पर 'संस्थागत समागम के अपेक्षा की गयी है किन्तु नशे की हालत में अथवा उन्मत्ता की स्थिति में पुरुष द्वारा स्त्री (पत्नी) के प्रति इस प्रकार का कुत्सित कृत्य, स्त्री द्वारा स्वयं को 'खूंटे से बंधी गाय , मानने पर विवश करती है। यह हिंसा यही विराम नहीं लेती है। दान-दहेज समेत अन्य कारणों से ससुराल पक्ष की महिलाओं द्वारा स्त्रियां प्राय: अपमानित की जाती हैं, उनके द्वारा किये गये मौखिक तथा शारीरिक घात-प्रतिघातों की खबरों से दैनिक समाचार पत्र भरे रहते हैं, स्त्री द्वारा स्त्री को ही भौतिक आग्रहों अथवा द्वेषवश लांछित एवं प्रताडि़त करना ससुराल पक्ष की उच्चता के पारम्परिक दुराग्रहों को प्रतिबिम्बित करता है।

दीगर है कि यह पारम्परिक दुराग्रह सदियों से स्त्री समाज को पीढ़ी दर पीढ़ी, विरासत के रुप में हस्तान्तरित होते आये हैं। आश्चर्य है इन पीड़ादायक और अपमानजनक पारम्परिक दुराग्रहों को नारी समाज ने बड़ जतन से संजोकर रखा है अर्थात स्त्री जब बहू बनकर आयी, तो उसने सभी प्रकार दर्द, पीड़ा और अपमान को अपना भाग्य मानकर सहा क्योंकि उसने बाल्यकाल में ही अपनी मां को भी सहते हुये देखा था। वक्त गुजरने के साथ-साथ मां-बहू के साथ ही जेठानी बनी। मां का 'परिवीक्षा काल'  समाप्त हुआ। पदोन्नति प्राप्त हुयी अब तक सही गयी, सही गयी समस्त प्रकार की पीड़ा अतीत की कटु स्मृतियां बन गयी। अब नई बहू का 'परिवीक्षा काल'  प्रारम्भ होगा। इस श्रृंखलाबद्ध अटूट अधिनायकवादी विचारधारा ने स्त्री जाति की सम्वेदनशीलता को तिरोहित कर दिया है। 'स्व के पूर्वाग्रह ने 'वयं के आग्रह को ठुकरा दिया है। इस पारम्परिक 'स्व के पूर्वाग्रह' का जब तक 'वयं का आग्रह हस्तान्तिरत नहीं करेगा, तब तक स्त्री घरेलू हिंसा में साझीदार बनती रहेगी।

इक्कीसवीं सदी में महिलाओं का आजीविका में जुडऩा भले ही नारी सशक्तिकरण की निशानी हो किन्तु यह तबका भी घरेलू हिंसा से प्रताड़ित होता रहता है। इण्टरनेशन्स सेन्टर फॉर रिसर्च ऑन वीमन नामक संस्थान के अनुसार 37 फीसदी कामकाजी महिलायें घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं।

ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग के अनिल वर्मा तथा अमेरिका में संयुक्त राष्ट्र से जुड़े भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी के घरेलू हिंसक मामले, ने राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों में खासी सुर्खियां बटोरी थीं। यह तथ्य दिखाते हैं कि तमाम सामाजिक सुधारों, आर्थिक, शैक्षिक तरक्की तथा हिंसा निरोधक कानूनों के बावजूद घरेलू हिंसा हमारे शिक्षित समाज के हर स्तर पर मौजूद है और उसे राज्य-समाज से सामाजिक स्वीकृति भी हासिल होती रहती है। प्रताड़ित करने वाले पुरुषों से हमारा समाज गांधी, गौतम सरीखी करुणा और सम्वेदनशीलता की उम्मीद नहीं करता है किन्तु हिंसा शिकार स्त्री से यह अपेक्षा की जाती है कि घर की इज्जत बचाने के लिये, गम खाकर घर की बात घर में रखे। ऐसे मनोवैज्ञानिक दबावों के कारण घरेलू हिंसा कानून-2005 समाज में घरेलू हिंसा के विरुद्ध पूर्णतय: दबाव नहीं बना पाने में असफल रहा है। 70 फीसदी घरेलू हिंसा के मामले घर की आबरू की दुहाई के कारण कानून की दहलीज तक नहीं पहुंच पाते हैं। लेकिन इस कानून ने स्त्री को हिंसा के विरोध हेतु शक्ति प्रदान की है, साथ ही पीडि़क पक्ष पर मानसिक दबाव भी कायम किया है। अभी इस कानून के सम्बन्ध में और अधिक जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय महिला आयोग के घरेलू हिंसा सम्बन्धी ऑकड़ों पर दृष्टिपात करें, तो उत्तर प्रदेश घरेलू हिंसा में अव्वल है। कुल दो हजार नौ सौ तिरान्वे दर्ज मामलों में एक हजार सात सौ सरसठ मामले उत्तर प्रदेश से हैं। दिल्ली ने दूसरा तथा राजस्थान ने तीसरा स्थान प्राप्त कर अपने-अपने राज्य का 'पौरुष प्रदर्शन किया है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश और दिल्ली की मुख्यमन्त्री भी महिला हैं। घर में घरेलू हिंसा के चलते बच्चों पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। बच्चों में हिंसा से डर पैदा होता है। कई बार यह डर उन्हें आक्रामक बना देता है। बच्चे और बच्चियां हिंसा को सामान्य व्यवहार मानने लगते हैं। लड़कियां डिप्रेशन, तनाव और नाउम्मीदी की शिकार हो जाती हैं। सामाजिक संगठनों, मीडिया, शिक्षा केन्द्रों के प्रयासों से अब जागरूकता के प्रतिशत में बढ़ोत्तरी परिलक्षित हो रही है। इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि आर्थिक मोर्चे पर औरत की गैर बराबरी की स्थिति उसे हर प्रकार से कमजोर करती है। सामाजिक प्रताडऩा से लडऩे की शक्ति तो घरेलू हिंसा कानून ने स्त्रियों को प्रदान कर दी है साथ ही जागरूकता के चलते अब स्त्री और पुरुष के सम्बन्धों में बराबरी और चयन की आजादी के बुनियादी सवाल उठने लगे हैं।

महिलाओं में एक समर्पित गृहणी और खामोश धरोहर के पाम्परिक रुढि़वादी खांचे से बाहर निकलने की जद्दोजहद दिखने लगी है। वह अपने प्रति हिंसा के पश्चात घर व परिवार की आबरु के नाम पर भावनात्मक मूर्ख बनने की जगह आत्म सजग महिला की भांति प्रत्येक स्तर पर प्रतिवाद करती है। मानवाधिकारों का हवाला देते हुये प्राथमिकी दर्ज कराती है, तो समाज की रुढिय़ों के ठेकेदार को दाम्पत्य का सही मर्म समझने की सीख भी देती हैं। यह सत्य है कि घरेलू हिंसा से मुक्ति की राह में स्त्री समाज ने अभी चलना ही शुरु किया है किन्तु हर बड़ी विजय एक छोटे स्वप्न और लडख़ड़ाते प्रयासों का विस्तार होती हैं, अत: स्त्री समानता और सशक्तिकरण का स्वप्न एक दिन जरूर यर्थाथ बनेगा। फिलहाल अभी तो बाघ, बकरी का शिकार कर रहा है।

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लेखक / पत्रकार

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