छत्तीसगढ़ के एकमात्र ब्रेल प्रिंटिंग प्रेस में अब छप रही हैं धार्मिक किताबें

प्रदेश के दृष्टिहीनों को एक फोन पर मुफ्त में पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध कराता है ये प्रेस

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यह लेख छत्तीसगढ़ स्टोरी सीरीज़ का हिस्सा है...

छत्तीसगढ़ में कोर्स के अलावा साहित्य और धार्मिक किताबों का लाभ दृष्टिहीनों को मिलने लगा है। केंद्र सरकार देश के जिन 16 प्रिंटिंग प्रेसों को मार्डन व स्टैंडर्ड बनाना चाहती है, उसमें यह भी शामिल है।

प्रिंटिंग प्रेस में छपती किताबें
प्रिंटिंग प्रेस में छपती किताबें
प्रेस के प्रभारी प्रशांत मुकासे ने बताया कि किसी भी दृष्टिबाधित को किताबों के लिए भटकने की या यहां आने की जरूरत नहीं। वह एक फोन, ई-मेल या ब्रेल पत्र के जरिए भी आर्डर कर सकता है। उसके दिए पते पर किताबें पहुंच जाएंगी।

बिलासपुर के तिफरा क्षेत्र में स्थित प्रदेश का एकमात्र ब्रेल प्रिंटिंग प्रेस अब पाठ्यपुस्तकों के साथ धार्मिक किताबें भी छाप रहा है। इसमें गीता, रामचरित मानस और रामायण जैसी किताबें छापी जा रही हैं। हिंदी साहित्य की किताबों का प्रकाशन पहले से किया जा रहा है। खास बात ये कि प्रदेश के किसी भी कोने से मांग आने पर उन्हें फ्री में किताबें भेजी जाती हैं। यह संभव हो सका नार्वे से अत्याधुनिक ब्रेल प्रिंटिंग मशीन की वजह से। इसलिए कोर्स के अलावा साहित्य और धार्मिक किताबों का लाभ दृष्टिहीनों को मिलने लगा है। केंद्र सरकार देश के जिन 16 प्रिंटिंग प्रेसों को मार्डन व स्टैंडर्ड बनाना चाहती है, उसमें यह भी शामिल है।

पहले जिस मशीन में छपाई होती थी, उसकी क्षमता कम होने की वजह से ब्रेल बुक्स की डिमांड पूरी नहीं हो पाती थी। इसे देखते हुए नार्वे से प्रिंटिंग मशीन खरीदने का निर्णय लिया गया। राष्ट्रीय दृष्टिबाधितार्थ संस्थान देहरादून की टीम ने जब ओके रिपोर्ट दी तो केंद्र सरकार ने 35 लाख का चेक दिया। अाज उसी मशीन से तमाम पुस्तकों की छपाई हो रही है। अब राजीव गांधी शिक्षा मिशन के भी आर्डर पूरे हो रहे हैं। खास बात ये कि कोर्स किताबों के अलावा पर्याप्त मात्रा में गीता, रामायण, रामचरित मानस आदि पुस्तकें छापी जा रही हैं। ऐसी किताबें देश के इक्का-दुक्का ब्रेल प्रेस में प्रिंट की जाती हैं। बिलासपुर में पुस्तकें छापने के अलावा बाइडिंग भी की जा रही है।

प्रेस के प्रभारी प्रशांत मुकासे ने बताया कि किसी भी दृष्टिबाधित को किताबों के लिए भटकने की या यहां आने की जरूरत नहीं। वह एक फोन, ई-मेल या ब्रेल पत्र के जरिए भी आर्डर कर सकता है। उसके दिए पते पर किताबें पहुंच जाएंगी। एक रुपया नहीं लगेगा। प्रेस से ऐसे दृष्टिबाधित शिक्षकों को भी मुफ्त किताबें दी जाती हैं, जो ब्रेल में पढ़कर सामान्य बच्चों को पढ़ाते हैं। गर्मी के दिनों में उन्हें साहित्य से जोड़े रखने के लिए साहित्यिक किताबें भी छापी जाती हैं। ई-लाइब्रेरी में 11000 पुस्तकों का संग्रह है। हमसे यूजर आईडी और पासवर्ड लेकर कोई भी इन किताबों का अध्यध्यन कर सकता है। इसमें कोर्स के अलावा सामान्य ज्ञान, साहित्य, कविताओं की किताबें भी है। इस तरह प्रेस में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल भी बखूबी हो रहा है। उन्हें ज्यादा से ज्यादा सुविधा देने के प्रयास किए जा रहे हैं।

प्रेस ने दो साल के संघर्ष बाद ब्रेल कैलेंडर भी बनाया है। मोटे कागज पर उभरे हुए डाट्स को उंगलियों से महसूस कर दिन, तारीख और महीने को समझा जा सकता है। यहां से 13 संस्थाओं को यह कैलेंडर मुफ्त में भेजा जाता है। देश के किसी भी कोने से कोई भी दृष्टिहीन इसे मुफ्त में मंगवा सकता है। राजनांदगांव में लुई ब्रेल की 206वीं जयंती पर सैकड़ों दृष्टिहीनों को यह फ्री में दिया गया। बताया गया कि पहले ब्राइलो 600 एसआर मशीन से 1800 पेज प्रति घंटे की छपाई हो पाती थी, लेकिन नई मशीन आने से इसकी रफ्तार बढ़ गई। अब हर घंटे 2200 से 2500 पेज की छपाई हो रही है।

इस मशीन से एक साथ चार पेज छपकर निकलते हैं। इससे किताबों की छपाई आसान हो गई है। इससे देशभर से आने वाले आर्डर को पूरा करने में भी ज्यादा समय नहीं लग रहा। इससे पहले दृष्टिहीनों के जीवन में सकारात्मक बदलावा लाने के लिए 2007 में चित्रकूट के रामानंदाचार्य तुलसी पीठ के पीठाधीश रामभद्राचार्य ने खुद की लिखी भगवत गीता का ब्रेल संस्करण कराया था। प्रकाशक पं. रामकुमार शर्मा कृष्णा चालीसा, हनुमान चालीसा, दुर्गा चालीसा का ब्रेल संस्करण कर चुके हैं। लोगों का कहना है कि प्रेस में छप रही धार्मिक किताबों से दृष्टिहीनों में धर्म के प्रति जागरूकता आएगी।

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