कुछ भी, कहीं भी ले जाएं, Shippr.in की लें सेवाएं

लाॅजिस्टिक्स के क्षेत्र में काम करने वाले परिवार से संबंध रखने वाले इंजीनियर रोहित फर्नांडीज़ के दिमाग की उपज है यह सेवासितंबर 2014 में बाजार में कदम रखने के बाद से बहुत तेजी से लोगों के बीच पैठ बना रहा है स्टार्टअपलाॅजिस्टिक्स के क्षेत्र में तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ाते हुए व्यापार को नई ऊँचाईयों तक ले जाना है लक्ष्यजल्द ही बैंगलोर के अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी विस्तार की है योजना

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सिर्फ भारत में ही लाॅजीस्टिक्स करीब 120 बिलियन डाॅलर का कारोबार है और इतना बड़ा कारोबार होने के बावजूद इसका संचालन बेहद पारंपरिक और अकुशल तरीके से किया जा रहा है। धीरे-धीरे और किश्तों में ही सही लेकिन लेकिन अब यह उद्योग तकनीक को अपनाने में आगे आता जा रहा है और आने वाले समय में इसके संचालन में भारी सुधार होने की संभावनाएं हैं। इसी कड़ी में सिलिकाॅन वैली के नाम से मशहूर बैंगलोर में लगातार सामने आ रहे स्टार्टअप्स की कड़ी में एक और नाम उभरकर सामने आ रहा है और वो है Shippr का। ‘शिपर’ लोगों को कुछ भी, कहीं भी ले जाने में मदद करने का इरादा रखता है। उपयोगकर्ता को सिर्फ इतना करना होता है कि उसे सामन लेने के स्थान और उसे पहुंचाने के गंतव्य की जानकारी इन्हें देनी होती है और बदले में ये अपनी कीमत वसूलते हैं। फिलहाल यह सेवा फोन के माध्यम से भी उपलब्ध है और ये लोग प्रत्येक वितरण के लिये न्यूनतम 500 रुपये वसूलते हैं।

इसके संस्थापक रोहित फर्नांडीज़ एक इंजीनियर होने के अलावा आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन और लाॅजिस्टिक्स में परास्नातक हैं। इससे पहले वे सालाना 20 मिलियन पाउंड के इन्वेंट्री बजट का सफल प्रबंधन करते हुए ब्रिटेन में स्थित एक नामचीन खाद्य आपूर्ति श्रृंखला के साथ काम कर रहे थे। इसके अलावा उनका परिवार पूर्व से ही लाॅजिस्टिक्स के काम केे साथ ही जुड़ा रहा है। रोहित कहते हैं, ‘‘मैंने बचपन से ही बेड़े के मालिकों, चालकों और इनकी सेवाएं लेने वाले उपभोक्ताओं के सामने आने वाली रोजमर्रा कर परेशानियों को देखा और भुगता है और हर किसी का एक सामान्य सा रवैया होता है कि ‘ये नहीं बदलेगा’। लेकिन भारत में लाॅजिस्टिक्स का क्षेत्र बहुत विशाल है जो करीब 120 बिलियन डाॅलर के आसपास का होने का अनुमान है लेकिन फिर भी इसमें बड़े पैमाने पर संरचना और संगठन का अभाव है। और  Shippr.in के द्वारा हमारा इरादा इस ‘यह नहीं बदलेगा’ की मानसिकता कोे ‘बदल गया’ में परिवर्तित करने का है।’’

रोहित ‘शिपर’ को शुरू करने वाले अकेले शख्स नहीं हैं। अपनी इस सोच को मूर्त रूप देने के लिये इन्हें साथ मिला अपने ही जैसे एक स्टार्टअप के प्रति दीवाने और कंप्यूटर साईंस में स्नातक कर चुके फणींद्र हेगड़े का। इनके अलावा आॅपरेशंस की पृष्ठभूमि से आने वाले एक और इंजीनियर राहुल अरुण इस टीम के एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।

राहुल हमें जानकारी देते हैं कि भारत में कार्यरत 70 प्रतिशत के करीब ट्रांसपोर्टरों के पास अपने 5 से कम वाहन हैं और इस वजह से वे अपने आस-पास की वृहद मांग की चुनौती को पूरा कर पाने में असमर्थ रहते हैं। और अगर उपभोक्ताओं की बात करें तो उनके लिये यह जानना बेहद मुश्किल है कि कौन सा ट्रांसपोर्टर भरोसेमंद है और कौन सा नहीं। ‘शिपर’ एक ऐसे उद्यम की स्थापना करना चाहता है जो उपभोक्ताओं को एक कुशल, टिकाऊ और विश्वसनीय समाधान उपलब्ध करवाने में सक्षम हो।

‘शिपर’ अभी अपने शुरुआती चरणों में है और बीते सितंबर महीने में ही इसकी स्थापना हुई है। इतने छोटे से समय के भीतर ही 600 से अधिक लोगों ने जानकारी प्राप्त करने की इच्छा के साथ इनसे संपर्क किया जिनमें से 60 सफल व्यापारिक समझौतों में बदले। लाॅजिस्टिक्स की छोटी-मोटी आवश्यकताओं की पूर्ति करने की दिशा में ‘मिनी-शिपर’ इनका पहला उत्पाद है। रोहित कहते हैं, ‘‘कई लोग अब कुछ भी नया खरीदने से पहले या फिर किसी पुरानी चीज का सौदा करने से पहले जानकारी लेने के लिये हमारी वेबसाइट का उपयोग करते हैं। जल्द ही हम अपना विस्तार काॅर्पोरेट सेगमेंट में करते हुए एक नया उत्पाद लाने की तैयारी में हैं जो भारतभर के छोटे और लघु उद्योगों को अपना माल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने में मदद करेंगे।’’

बाजार में पहले से ही पांव जमाए बड़े खिलाड़ी अब आॅनलाइन ट्रैकिंग का उपयोग करते हुए अपने उपभोक्ताओं को अन्य कई सेवाएं उपलब्ध करवा रहे हैं लेकिन इस सबके बावजूद उपभोक्ता अभी भी एक संपूर्ण सुखद अनुभव से कोसों दूर ही हैं। इस क्षेत्र के ‘डेल्हीवरी’ जैसे पुराने दिग्गज और कुछ दिन पहले ही व्यापार में आने वाले ‘लाॅजीनेक्स्ट’ अपने ही रास्तों में बाधाएं खड़ी करते जा रहे हैं और ई-काॅमर्स के उद्गम ने विशेष रूप से लाॅजिस्टिक्स के क्षेत्र में तकनीक के इस्तेमाल को प्रोत्साहन देने का ही काम किया है। ‘शिपर’ ने तो अभी सिर्फ अपने सफर की शुरुआत ही की है ओर भविष्य में यह देखना वाकई में काफी दिलचस्प होगा कि वे बैंगलोर में अपने अभियान को और अधिक कारगर कैसे बनाते हैं और कैसे देश के अन्य हिस्सों में विस्तार करने में सफल होते हैं।

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