छत्तीसगढ़ के बीजापुर में सास-बहू सम्मेलन से सुधर रही है गर्भवती महिलाओं की स्थिति

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यह लेख छत्तीसगढ़ स्टोरी सीरीज़ का हिस्सा है...

भारत में परिवार नाम की संस्था की यही खूबी है कि यहां हर रिश्ते का अपना मतलब होता है। लेकिन धीरे-धीरे अब लोगों की सोच में परिवर्तन आने लगा है और सास भी बहू को बेटे की सिर्फ पत्नी न मान कर बेटी का दर्जा भी देने की कोशिश कर रही हैं, जिसका जीता जागता उदाहरण है छत्तीसगढ़ का बीजापुर।

सास-बहू सम्मेलन में स्वास्थ्य कार्यकर्ता, पर्यवेक्षक, एएनएम और मितानिन द्वारा सरकार द्वारा चलाई जाने वाली योजनाओं की जानकारी भी दी जाती है। इस जानकारी में परिवार नियोजन, बर्थ कंट्रोल और गर्भ धारण करने की इच्छा जैसे मुद्दे शामिल होते हैं।

हमारे समाज में सास-बहू के संबंधों को लेकर ऐसी बातें अक्सर कही जाती हैं, जैसे उनमें छत्तीस का आंकड़ा हो। भारत में परिवार नाम की संस्था की यही खूबी है कि यहां हर रिश्ते का अपना मतलब होता है। लेकिन धीरे-धीरे अब लोगों की सोच में परिवर्तन आने लगा है और सास भी बहू को बेटे की सिर्फ पत्नी न मान कर बेटी का दर्जा भी देने की कोशिश कर रही हैं, जिसका जीता जागता उदाहरण है छत्तीसगढ़ का बीजापुर।

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में सास-बहू का एक अनोखा ही रिश्ता देखने को मिल रहा है। यहां गर्भवती महिलाओं की अच्छे से देखभाल और उनके होने वाले बच्चों में कुपोषण की संभावना को खत्म करने के लिए सास-बहू सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। इस सम्मेलन में मां और बच्चे के स्वास्थ्य के प्रति लोगों में विशेष रूप से महिलाओं में जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया जाता है।

गांवों में लोगों के स्वास्थ्य की देखभाल करने में घर-परिवार की महिलाओं की अहम भूमिका होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा हर महीने के पहले सप्ताह में छत्तीसगढ़ के बीजापुर में सास बहु सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। इस सम्मेलन में गांव में महिलाओं की सास या परिवार की वरिष्ठतम महिला को आंगनबाड़ी केंद्रों पर इकट्ठा किया जाता है और फिर उनसे स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर विस्तृत चर्चा के साथ ही स्वास्थ्य संबंधी जानकारी भी दी जाती है।

छत्तीसगढ़ का बीजापुर जिला आदिवासी बहुल जनसंख्या वाला जिला है जो कि अतिसंवेदनशील और नक्सल प्रभावित भी है। इस वजह से यहां गरीबी, अशिक्षा और आधारभूत संरचनाओं की काफी कमी रही है। फलस्वरूप महिलाओं को कुपोषण और गर्भावस्था से जुड़ी जानकारी प्रदान करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण हो जाता था। लेकिन मौजूदा समय में स्थिति बदल रही है। कई सरकारी योजनाओं ने गांव की तस्वीर ही बदल दी है।

सास-बहू सम्मेलन में स्वास्थ्य कार्यकर्ता, पर्यवेक्षक, एएनएम और मितानिन द्वारा सरकार द्वारा चलाई जाने वाली योजनाओं की जानकारी भी दी जाती है। इस जानकारी में परिवार नियोजन, बर्थ कंट्रोल और गर्भ धारण करने की इच्छा जैसे मुद्दे शामिल होते हैं। इसके लिए मनोरंजक तरकीबें भी अपनाई जाती हैं। जैसे महिलाओं की टीम बनाकर प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं और जीतने वाली टीम को पुरस्कृत भी किया जाता है।

गांव में कई महिलाएं ऐसी होती हैं जिनका विवाह कुछ दिन पहले ही हुआ होता है। लेकिन उचित जानकारी के आभाव में उन्हें गर्भधारण करने में समस्या आती है। ऐसे में उन्हें अपनाई जाने वाली सावधानियां, गर्भावस्था में खान-पान और गांव में प्रचलित अवधारणाओं से निपटने के बारे में सिखाया जाता है। गांवों में कई सारी अवधारणाएं प्रचलित हैं, जैसे गर्भवती महिला को प्रसव के तीन दिन तक खाना नहीं दिया जाता उसे सिर्फ चावल के साथ लहसुन और मिर्च का मिश्रण दिया जाता है। महिलाओं में यह धारणा है कि इससे पैदा होने वाला शिशु खतरों से मुक्त रहेगा और उसे कोई बीमारी नहीं होगी। लेकिन वाकई में ऐसी परंपराएं जच्चा और बच्चा दोनों के लिए हानिकारक साबित हो जाती हैं।

इस पहल से गांव की महिलाओं में काफी सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिला है। अब महिलाएं घर पर ही प्रसव कराने की बजाय अस्पताल जाने लगी हैं और प्रसव के एक घंटे के भीतर स्तनपान कराने की प्रवृत्ति में भी बढ़ोत्तरी हुई है। वहीं मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में काफी कमी आई है। जिले में सास बहु सम्मेलन के आयोजन के फलस्वरूप वर्ष 2016 की तुलना में 2017 में 0-12 और 12-24 महीने के बच्चों में कुपोषण में गिरावट दर्ज की गई। 2016 में 0-12 माह के बच्चों में कुपोषण का स्तर 40.15 था जो कि 2017 में घटकर 33.4 प्रतिशत पर आ गया। 12-24 माह के बच्चों में कुपोषण का स्तर 39 से घटकर 36 प्रतिशत पर आ गया।

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