'परिक्रमा', सबसे गरीब बच्चे को सबसे अच्छे अवसर दिलाने की कोशिश का नाम

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शुक्ला बोस ने सफल कॉर्पोरेट करियर के बाद शिक्षा के क्षेत्र में किया काम...


हरे और मैरून रंग के लिवास में, बाल बधें हुए और माथे पर एक गोल बड़ी बिंदी में सजीं शुक्ला बोस अपने ड्रीम वेंचर ‘परिक्रमा ह्यूमैनिटी फाउंडेशन’ के बारे में विश्वास के साथ बात करती हैं... "parikrma में ‘a’ नहीं है। यह मूल रूप से संस्कृत से लिया गया है। Parikr’a’ma देवनागरी संस्करण है।” शुक्ला बोस मजाक में कहती हैं कि ‘कम्पेरेटिव लिटरेचर’ में जादवपुर यूनिवर्सिटी से एमए इन बारीकियों पर ध्यान देने के लिए ही उन्होंने किया है।

शुक्ला ‘Parikrma Humanity Foundation’ की संस्थापक और सीईओ हैं, जिसका सिद्धांत ‘जीवन समान शर्तों पर’ है। फाउंडेशन का मिशन, सबसे गरीब बच्चे भी दुनिया में सबसे अच्छे अवसरों का उपयोग कर सकें, यह सुनिश्चित करना है। उन्होंने 12 साल पहले 165 छात्रों के साथ राजेंद्रनगर से शुरुआत की थी। आज फाउंडेशन सफलतापूर्वक बेंगलुरु शहर के जयनगर, सहकारनगर, कोरमंगला और नंदिनी लेआउट स्थानों पर चार स्कूलों में 1700 छात्रों को शिक्षा देता है।

यह विचार शुक्ला के दिमाग में पहले से था। या कहें एक तरह से बचपन में से ही। उनका बंगाली परिवार दार्जीलिंग में रहता था। ब्यूरोक्रेट होने के नाते उनके पिताजी की पोस्टिंग यहां थी और उनकी माँ एक अच्छी ग्रहणी थीं।

शुक्ला कहती हैं 
“मैं अपने माता-पिता की लाडली थी विशेष रूप से माँ की। मेरा जन्म पांच गर्भपात के बाद हुआ और डेढ साल बाद मेरे भाई का जन्म हुआ। लेकिन मैं हमेशा से अपने माता-पिता की लाडली रही। जेंडर की बाधाओं का सामना मुझे नहीं करना पड़ा और मेरा बचपन बहुत ही बेहतर रहा। मैं अच्छे शैक्षिक संस्थानों में गयी।” 

हालांकि उनके पिता ने उनके लिए कुछ नियम बनाये थे। एक ईमानदार सरकारी कर्मचारी होने के नाते, वे सात में से एक भी गाड़ी का उपयोग अपनी बेटी के लिए नहीं करते थे। ये सिर्फ ऑफिस के काम के लिए थीं। जिसके कारण शुक्ला को छः किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ता था।

वह कहती हैं, “हमारा जीवन साधारण तरीके से बीता, लेकिन ऐसे वातावरण में बड़ा होना प्रेरणादायक था। आज मैं जो कुछ भी हूँ इन्ही कारणों से हूँ।” शुक्ला का मानना हैं कि शिक्षा आप को सशक्त बनाती है। शायद इसीलिए वह हमेशा से एक अच्छी छात्र रहीं। उन्होंने कॉलेज कोलकाता से किया, जहाँ पर वह बोर्डिंग में रहीं। वह हंसते हुए कहती हैं, “यह मेरा स्वतंत्रत होने का पहला मौका था।” 1976 में जब वह 19 साल की थी तब उनकी शादी हो गयी और वह अपने पति के साथ भूटान चली गयीं।

पहला स्कूल

शुक्ला ने भूटान में इंडियन आर्मी के बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा उठाया। यह उनके लिए एक अदभुत अनुभव था। वह स्कूल में प्रतिदिन के काम और सिलेबस को देखती थीं। कुछ दिन गुजरे पर कहते हैं हर किसी को हर जगह अच्छी नहीं लगती। शुक्ला कहती हैं वहां का पानी उन्हें रास नहीं आया और वह भारत वापस आ गयीं। भारत आकर उन्होंने ‘कम्पेरेटिव लिटरेचर’ में ‘एमए’ किया और हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में काम किया। काम के साथ-साथ उन्होंने ‘सेल्स एंड मार्केटिंग’ में ‘एमबीए’ किया।

संतोषजनक कॉर्पोरेट करियर

शुक्ला ने अपने करियर की शुरुआत कोलकाता में ओबेराय ग्रांड से की और धीरे-धीरे कॉर्पोरेट की सीढ़ी चलने लगीं। शुक्ला स्टाफ के लिए पहले समाचार पत्र शुरू करने की घटना को याद करते हुए कहती हैं कि यह जीवन की कुछ ऐसी बातें थी जो वाकई काफी दिलचस्पी थीं। अकसर हम नहीं जानते कि सपोर्ट स्टाफ कई अन्य चीजों में अच्छा होता है। इस समाचार पत्र ने वास्तव में अच्छा किया। इससे स्टाफ में अच्छा तालमेल बनने लगा। वो मानती हैं कि इन चीज़ों में मदर टेरेसा की बड़ी भूमिका थी दरअसल उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों से मदर टेरेसा के साथ सात साल तक काम किया। इन सात सालों में उन्होंने शिशु भवन में बच्चों की देखभाल करती रहीं थीं।

सफल कंपनी के कार्यकाल को अलविदा

26 साल के सफल कॉर्पोरेट जीवन के बाद शुक्ला ने इसे अलविदा कह दिया। 

“मैं अपने कॉर्पोरेट करियर के पीक पर थी, लेकिन मैंने जीवन में बदलाव के लिए, कुछ और करने का निर्णय लिया। इसलिए 2000 में, अपने सफल कॉर्पोरेट जीवन को अलविदा कह दिया।" इसके बाद उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय NGO के प्रमुख के रूप में काम शुरू किया। यह NGO बहुत से देशों में अलग-अलग प्रोजेक्ट में काम करता हैं और भारत में इसकी एमडी होने के नाते उन्होंने शिक्षा को प्रोजेक्ट थीम चुना।

एक बार सफलता मिलने के बाद, उन्होंने अपनी बचत से 2003 में ‘parikrma’ शुरू किया। यह एक जोखिम भरा काम था, लेकिन उन्हें अपने आईडिया पर विश्वास था और इस संघर्ष से सफलतापूर्वक बाहर निकली।

वह अपने वेंचर में बेहतर से बेहतर कॉर्पोरेट पद्धतियों को लागू किया। उन्होंने लोगों को समझाया और उन्हें उनके लक्ष्य के लिए प्रेरित किया। इसका परिणाम ये निकला कि कठिन कार्य और जुनून ने parikrma को एक नई ऊचाई पर पहुँचाया। कॉर्नेल यूनिवर्सिटी और आईआईएम बेंगलुरु में ‘Parikrma Humanity Foundation’ को चैप्टर के रूप में सम्मलित किया है।

लगाव और शौक

पढ़ना शुक्ला का शौक रहा है और हाल ही में उन्होंने ‘Clementine Ogilvy Spencer-Churchill’s biography’ पूरा किया है, जिसे विंस्टन चर्चिल की बेटी ने लिखा है। शुक्ला को अपने परिवार के लिए खाना बनाना पसंद है। वह सुबह 4:30 बजे उठ जाती हैं जिससे उन्हें अपने और खाना बनाने के लिए समय मिल जाता है। वह टेलिविज़न पर कुछ शो भी देखती हैं। उनके पास घर में 5 कुत्तें हैं और प्रत्येक स्कूल में एक-एक हैं और उन्हें घुमाना भी पसंद है।

उनके आदर्श

शुक्ला के तीन आदर्श हैं – मदर टेरेसा, सर निकोलस विन्टन(ब्रिटिश मानवतावादी, जिन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी अधिकृत चेकोस्लोवाकिया से 669 बच्चों को बचाया था) और दलाई लामा। वह कहती हैं, “ उनकी सादगी और मानवता मुझे पसंद है। उनका दूसरो के बारे में सोचना उन्हें महान बनता है।”

छात्रों की अक्का यानी शुक्ला बोस का एक सपना है- 20 साल बाद सुबह 8:15 पर स्कूल की असेंबली में होना। “यह स्कूल parikrma के छात्रों द्वारा शुरू होना चाहिए|”

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