महिला सिपाही ने बनाया गरीब बच्चों का फुटबॉल क्लब 

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पुलिस महानिदेशक को जब पता चला कि उनके विभाग की कांस्टेबल रंजीता ने कूड़ा बीनने वाले बच्चों का फुटबॉल क्लब बनाया है, उसके सिखाए बच्चे नेशनल टीम तक पहुंच चुके हैं तो उन्होंने तुरंत इस महिला पुलिसकर्मी को 5000 के इनाम से नवाजा। रंजीता को इस काम में अपने डिजायनर पति, पत्रकारों, अपने परिजनों, विभाग का आला अधिकारियों से भी मदद मिलती रहती है।

रंजीता सिंह (बाएं) दाएं तस्वीर सांकेतिक
रंजीता सिंह (बाएं) दाएं तस्वीर सांकेतिक
रंजीता भारतीय महिला फुटबॉल टीम की सदस्य रह चुकी हैं। अब वह बच्चों को पिछले 10 सालों से फुटबॉल खेलना सिखा रही हैं। उनके कई स्टूडेंट्स राष्ट्रीय टीम में अपनी जगह बना चुके हैं।

भोजपुर (बिहार) की रहने वाली रंजीता की जब नक्सल प्रभावित मुंगेर जिले में पोस्टिंग हुई, तब तक उन्हें कोई नहीं जानता था। उस समय बस वह एक कांस्टेबल थीं, जिससे चोर डरते थे। आज अपनी पुलिस की ड्यूटी को अच्छे से निभाने के साथ ही कूड़ा बीनने वाले बच्चों को फुटबॉल सिखाने वाली रंजीता पर हर किसी को गर्व है। बत्तीस वर्षीय कांस्टेबल रंजीता ने अपनी ओहदे से ज्यादा ऊंची पहचान बना ली है। रंजीता ने सड़क पर कूड़ा-कचरा बीनने वाले बच्चों के साथ मिलकर 'चक दे फुटबॉल क्लब’ बनाया है। उनके इस काम की हर कोई सराहना कर रहा है। रंजीता मुंगेर जिला पुलिस बल में वर्ष 2008 में कांस्टेबल के तौर पर शामिल हुई थीं। उनके लिए यह जगह नई नहीं थी क्योंकि पिता की नौकरी के दौरान वह कुछ समय तक उनके साथ यहां रह चुकी थीं।

रंजीता भारतीय महिला फुटबॉल टीम की सदस्य रह चुकी हैं। अब वह बच्चों को पिछले 10 सालों से फुटबॉल खेलना सिखा रही हैं। उनके कई स्टूडेंट्स राष्ट्रीय टीम में अपनी जगह बना चुके हैं। रंजीता प्रशिक्षण के दौरान अपने बच्चों को पूर्व राष्ट्रपति ए़ पी़ जे. अब्दुल कलाम की उस पंक्ति को जरूर याद कराती हैं, जिसमें उन्होंने ऊंचे सपने देखने की बात कही थी।

कांस्टेबल रंजीता बताती हैं कि जब वह छोटी थीं तो अक्सर गंगा के किनारे बच्चों को सामान ढोते देखती थीं। उन्हें पता चल चुका था कि इस मशक्कत के बदले मिले पैसों से बच्चे नशा किया करते थे। उनको देखकर वह अकसर सोचने लगती थीं कि ये मेहनतकश बच्चे कहीं हमेशा के लिए नशे के आदती न बन जाएं। नशे की लत से दूर रखने के लिए रंजीता ने कूड़ा बीनने वाले बच्चों को इकट्ठे करना शुरू किया। इसके बाद उनके नाम स्कूल में दर्ज करवाए। रंजीता ने 'चक दे फुटबॉल क्लब' में न सिर्फ बच्चों को फुटबॉल का प्रशिक्षण दिया जाता, बल्कि सुबह और शाम को एक निजी शिक्षक की मदद से उन्हें ट्यूशन भी देना शुरू किया। रंजीता ने इसके बाद उन्हें लेकर फुटबॉल खेलना सिखाना शुरू कर दिया। इस तरह उनका 'चक दे फुटबॉल क्लब' बना।

रंजीता इन दिनों भागलपुर के मिर्जाचौकी क्षेत्र के 35 आदिवासी बच्चों को प्रशिक्षित कर रही हैं। इन्हें वे मुंगेर स्थित अपने आवास पर नि:शुल्क आवासीय सुविधा तक उपलब्ध करा रही हैं। उनके स्टूडेंट्स विकास, भोला, अमरदीप सहित लगभग आधे दर्जन बच्चे आज दानापुर आर्मी ब्याज और साईं सेंटर का हिस्सा बन चुके हैं। इसके साथ ही मुंगेरे जिले के पांच बच्चे पिछले वर्ष ही राष्ट्रीय फुटबॉल अंडर-13 टीम में जबकि दो बच्चे राष्ट्रीय फुटबॉल टीम अंडर-19 में सिलेक्ट हुए हैं। रंजीता सिर्फ ऐसे बच्चों को प्रशिक्षण देती हैं, जो आर्थिक रूप से बहुत कमजोर परिवारों के होते हैं। इस काम के लिए उन्हे न तो किसी औद्योगिक घराने से कोई मदद मिलती है, न ही किसी सरकारी संस्था से। अपने वेतन और समय-समय पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मदद से ही वह बच्चों को प्रशिक्षण दे रही हैं। उन्हें खेल सामग्री भी समय-समय पर पुलिस अधिकारी ही उपलब्ध कराते हैं। रंजीता को इस काम में अपने परिजनों का भी सहयोग मिलता है।

पिछले दिनों राज्य के पुलिस महानिदेशक अभयानंद ने अपने मुंगेर दौरे के वक्त रंजीता से मुलाकात की। डीजीपी ने इस काम के लिए शाबाशी देते हुए रंजीता को पांच हजार रुपये का पुरस्कार भी दिया। हाल ही में रंजीता को भागलपुर में तिलकामांझी राष्ट्रीय सम्मान (राजा कर्ण मीर कासिम सम्मान) से सम्मानित किया गय। बिहार पुलिस अकादमी के महानिदेशक गुप्तेश्वर पांडेय और तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य नलिनी कांत झा ने रंजीता के कार्यों को सराहा। रंजीता इन कामों में सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार कुमार कृष्णन से मदद मिलती रही है। रंजीता कहती हैं कि वह ऐसे बच्चों के लिए कुछ बेहतर कर पा रही हैं, इसके लिए उन्हें बड़ा सुख मिलता है। उन्होंने फुटबॉल खेल के माध्यम से ही पुलिस की नौकरी हासिल की थी और आज जिला व राज्य को बेहतर फुटबॉल खिलाड़ी देने का प्रयास कर रही हैं। उनके फैशन डिजाइनर पति रौशन राज भी इस कार्य से प्रसन्न हैं। वे जब भी यहां आते हैं, इन बच्चों की जरूरतों के बारे में पूछकर उसे पूरा करने की कोशिश करते हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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