फल बेचकर परिवार का पेट भरने वाले ने बनाई सोलर कार

3000 कि.मी की यात्रा कर बेंगलुरू से पहुंचे दिल्ली।

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पूर्व राष्ट्रापति एपीजे अब्दुल कलाम को अपना आदर्श मानने वाले बेंगलुरू के सज्जाद अहमद नई दिल्ली के आईआईटी परिसर में आयोजित विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं औद्योगिक एक्सपो में अपने आविष्कार ‘‘सोलर इलेक्ट्रिक कार’’ लेकर पहुंचे। उन्होंने अपनी कार हर उस व्यक्ति को उत्‍साह के साथ दिखाई, ज़ाहिर है लोगों की दिलचस्पी बढ़नी ही थी।

भारत में पहली बार आयोजित हुए इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टीवल (आईआईएसएफ) के तहत आयोजित एक्सपो में हिस्सा लेने के लिए अहमद ने बेंगलुरू से दिल्ली का 3,000 किलोमीटर का सफर अपनी इसी कार में पूरा किया। यह यात्रा काफी कठिन थी जिसके दौरान उन्होंने विंध्य पर्वतमाला को भी पार किया। इस यात्रा में उन्हें 30 दिन लगे।

कैसे चलती है ये कार

उनकी इस सोलर इलेक्ट्रिकल कार में पांच सोलर पैनल लगे हुए हैं, जिसमें हर एक की क्षमता 100 वाट है। उपकरणों से लैस उनकी इस कार के पैनल से पैदा की गई ऊर्जा छह बैटरी के जरिये मोटर को चलाती है। कार में लगी प्रत्येक बैटरी की क्षमता 12 वोल्ट और 100 एम्पियर है। उन्हें गर्व है कि उनकी यह कार इतनी लंबी यात्रा के परीक्षण में सफल रही है। उन्होंने बताया ‘यात्रा के दौरान ऐसा भी वक्त आया जब उन्हें लगा की उनकी यह कार ऊंची नीची सड़कों पर नहीं चल सकेगी। इसके बावजूद उनके इस आविष्कार ने उनका पूरा साथ दिया और इस दौरान उन्हें कोई रुकावट या समस्या का सामना भी नहीं करना पड़ा।

स्कूल ड्रापआउट से आविष्कारक तक का सफर

अहमद का जन्म कनार्टक के कोलार में हुआ। कक्षा 12 में ही पढ़ाई छोड़ने वाले अहमद ने जीवनयापन के लिए सबसे पहले फल बेचे। इसके बाद उन्होंने इलेक्ट्रानिक उपकरणों की मरम्मत के लिए एक दुकान खोली जिसमें वह ट्रांजिस्टर, टेप रिकार्डर, टीवी आदि ठीक किया करते थे। अपने काम को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कंप्यूटर भी ठीक करना शुरू कर दिया था। बचपन से उनका एक सपना था कि वह समाज के लिए कुछ करें। इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने इतने बड़े आविष्कार को करने के बारे में सोचा।

अहमद ने योरस्‍टोरी को बताया,

‘जब मैं स्कूल में था तो कोर्स की किताबों में वैज्ञानिकों के चित्रों को देखकर खुद भी एक वैज्ञानिक बनना चाहता था। हालांकि परिवार की जीविका चलाने के लिए मुझे 15 साल की उम्र में ही स्कूल छोड़ना पड़ा।’

इसके बावजूद समाज के लिए कुछ करने की चाह और आविष्कार करने की अहमद की इच्छा सदैव उनके दिल में बरकरार रही। इसका मौका उन्हें साल 2002 में मिला। अहमद ने कहा, 

‘मैंने खुद से कहा कि अब मेरी उम्र 50 वर्ष हो चुकी है और इससे पहले ही मैं बूढ़ा और असहाय हो जाऊं मुझे समाज के लिए कुछ करना चाहिए।’ 

उन्होंंने दोपहिया वाहन में इस प्रकार के बदलाव किये कि जिससे वह बिजली से चल सके। इसके बाद उन्होंने इसी मॉडल से तीन पहिया और चार पहिया वाहन भी बनाए। उनके इन आविष्कारों के लिए उन्हें कर्नाटक सरकार की ओर से पर्यावरण संरक्षण के लिए डॉ कलाम के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम में 2006 में पुरस्कृत भी किया गया।

अब तक वह देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित की जाने वाली विभिन्न विज्ञान प्रदर्शनियों में हिस्सा ले चुके हैं। उन्होंने कहा कि वह 1,10,000 किमी की यात्रा कर चुके हैं और भविष्य में भी विज्ञान के प्रसार को बढ़ावा देने के लिए यात्रा करते रहेंगे। उनकी इस यात्रा में उनके चचेरे भाई सलीम पाशा भी उनके साथ रहते हैं। सलीम पाशा एक कारोबारी हैं और रेशम के कारोबार से जुड़े हुए हैं।

अहमद की इस यात्रा का लक्ष्य स्पष्ट है। वह डॉ कलाम के 2020 के विजन यानि कि देश के कल्याण के सपने को साकार करना चाहते हैं। उनकी यह यात्रा लोगों को नवोन्मेश, आविष्कार के लिए प्रेरित और शिक्षित करने के लिए है।

दिल्ली के लिए उनकी यह यात्रा बेंगलुरू के राजभवन से 1 नवंबर को शुरू हुई थी। अहमद ने कहा कि अब वह अपने घर जाने से पहले हरिद्वार जाकर गंगा मैय्या का आशीर्वाद लेना और बाबा रामदेव से मिलना चाहते हैं। हरिद्वार के बाद वह रालेगण सिद्धी जाएंगे और अन्ना से भी मिलेंगे।