ऑनलाइन शॉपिंग में भी महिलाओं की मुरीद हुईं कंपनियां

अॉनलाइन शॉपिंग में भी महिलाओं ने मारी बाजी...

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दुनिया भर की कंपनियां आजकल महिलाओं की फिलिंग को ध्यान में रखते हुए नए-नए ब्रॉन्ड, तरह-तरह की चीजें बाजारों में आए दिन लॉन्च कर रही हैं। शॉपिंग ऑनलाइन हो या ऑफलाइन, ज्यादातर घरों में खरीदारी में सिर्फ महिलाओं की चल रही है। फैशन, ग्रॉसरी, गैजेट्स, फर्नीचर जैसे सामानों की शॉपिंग उन्हें लुभा रही है।

सांकेतिक तस्वीर (शटरस्टॉक)
सांकेतिक तस्वीर (शटरस्टॉक)
रिटेल कंपनियों का कहना है कि पिछले कुछ समय से महिलाओं की खरीदारी में जमकर बढ़त हो रही है। अपर और अपर मिडल क्लास की महिलाएं अच्छा दिखने और अच्छा महसूस करने के लिए सालाना लगभग एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करने लगी हैं। 

आधी आबादी के हक-हुकूक की बात अपनी जगह और मानवीय आदतें, तौर-तरीकें अलग। जैसे पुरुष वर्ग अपनी तमाम आदतों के कारण आलोचनाओं का शिकार होता रहता है, महिलाओं के साथ भी ऐसी कई बातें हैं, जो मुहावरे की तरह उन्हे अपने बारे में सुनकर अप्रिय लग सकती हैं। उन्हीं में एक है बाजार पर लट्टू होने, तरह-तरह की गैरजरूरी चीजों की भी खरीदारी की आदत। उनकी इसी आदत पर नजर गड़ाते हुए पूरी दुनिया में आजकल तमाम बड़ी कंपनियां नए-नए ब्रॉन्ड, तरह-तरह की चीजें बाजारों में आएदिन लांच कर रही हैं।

यह सच एक सर्वेक्षण में सामने आया है। सर्वेक्षण में देश के कई महानगर मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरू, चेन्नई आदि केंद्र में रहे। मुख्यतः सर्वेक्षण इन शहरों में हो रही ऑनलाइन खरीदारी में महिलाओं की अभिरुचि को ध्यान में रखकर किया गया। इसमें छब्बीस वर्ष से अधिक आयुवर्ग की लगभग तीन सौ शादीशुदा महिलाओं के विचार लिए गए। लगभग 46 प्रतिशत महिलाओं का कहना था कि घर में हर किसी के लिए ऑनलाइन शॉपिंग के निर्णय सिर्फ वही लेती हैं। चालीस प्रतिशत महिलाओं का कहना था कि कोई इस तरह का डिसीजन पूरा परिवार सोच-विचार कर लेता है लेकिन उसमें भी मुख्य रोल उन महिलाओं का ही होता है। सिर्फ चौदह फीसद महिलाओं का कहना था कि उनके घर के पुरुष ही ऐसी किसी खरीदारी के बारे में तय करते हैं।

सर्वेक्षण में पता चला कि ऑनलाइन खरीदारी के लिए महिलाएं नई-नई सेल का वेट करती रहती हैं। वेबसाइट्स के माध्यम से कीमतों का जायजा लेती रहती हैं। उनकी नजर डिस्काउंट कूपंस पर भी रहती है। फैशन, ग्रोसरी, गैजेट्स, फर्नीचर जैसे सामान उन्हें ज्यादा आकर्षित करते हैं। ऑनलाइन ज्यादातर खरीदारियों में आजकल पढ़ी-लिखी माताएं एवं दादियां मुखिया की तरह रोल अदा कर रही हैं।

आधुनिक विश्व बाजार के जानकारों का तो कहना है कि मंदी के हालात में खुदरा कारोबारियों को महिलाओं की खरीदारी की आदत से जीवनदान मिलता है। रिटेल कंपनियों का कहना है कि पिछले कुछ समय से महिलाओं की खरीदारी में जमकर बढ़त हो रही है। अपर और अपर मिडल क्लास की महिलाएं अच्छा दिखने और अच्छा महसूस करने के लिए सालाना लगभग एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करने लगी हैं। एक सर्वे के मुताबिक यह खर्चा कपड़ों, कोस्मेटिक्स और स्वस्थ खाने पर हो रहा है। जहां लाइफस्टाइल की कुल बिक्री का चालीस प्रतिशत महिलाओं से आ रहा है, वहीं शॉपर्स स्टॉप में महिलाओं की कैटेगरी में पचीस फीसदी तक की बढ़ोतरी पाई गई है। पुरुष सीमित खरीदारी करते हैं जबकि महिलाएं जमकर शॉपिंग करने लगी हैं।

इनकी शॉपिंग लिस्ट में कॉस्मेटिक्स, एक्सेसरीज और ट्रेडिश्नल कपड़ों के अलावा वेस्टर्न वियर भी शामिल है। देश में करीब एक करोड़ महिलाएं मैनेजर लेवल पर काम कर रही हैं, जो अधिकतर वेस्टर्न कपड़े खरीदती, पहनती हैं। बाजार और कंपनियों की रणनीति अब पुरुषों को भी इस तरह के रुझान में शामिल करने में जुटी है। रिटेलर उनकी भी आदतें बदलने की जुगत में है। फिलहाल तो महिलाएं ही बाजार को थामे हुए हैं। इसी आइडिया को ध्यान में रखते हुए आज लगभग 4400 करोड़ रुपए के वैल्यूएशन वाली दिल्ली की ब्रांडेड एथनिक वुमेन अपेरल मेकर टीसीएनएस क्लोदिंग कंपनी के प्रॉमोटर्स ओंकार सिंह पसरिचा बताते हैं कि उन्होंने अपने कारोबार की शुरुआत ही महिलाओं की खरीददारी की आदत को ध्यान में रखते हुए की थी।

उन्होंने दिल्ली के लाजपत नगर में अपना पहला स्टोर सन् 2002 में खोला था। महिलाओं की खरीददारी की आदत पर उनको स्टोर खोलने का आइडिया मिला था। जब उनका यह आइडिया गलत साबित लगने लगा, महिलाएं खरीददारी के लिए स्टोर में आती ही नहीं थीं तो वह वुमन क्लॉथ बेचने लगे। बिजनेस तेजी से बढ़ने लगा। अब उनकी कंपनी महिलाओं के लिए ब्रांडेड प्रोडक्ट सेल करती है। इन ब्रांड्स के तहत कंपनी वुमन एथनिक और फ्यूजन वेयर बेचती है। कंपनी के देश भर में इस समय चार सौ अठारह एक्सक्लूसिव ब्रांड आउटलेट्स, तेरह सौ पांच लार्ज फॉर्मेट स्टोर आउटलेट्स औऱ तेरह सौ इकसठ मल्टी ब्रांड आउटलेट्स हैं। इसके अलावा नेपाल, मॉरीशस और श्रीलंका में भी उनकी कंपनी एक्सक्लूसिव आउटलेट्स के जरिए महिलाओं वाले क्लॉथ प्रोडक्ट्स बेच रही है।

वुमन प्रॉडक्ट्स के अर्थशास्त्र के जानकारों का अनुमान है कि आगामी तीन-चार वर्षों के भीतर वुमन क्लॉथ मॉर्केट मेन मॉर्केट से आगे निकल जाएगी। एवेंडस कैपिटल की रिपोर्ट में बताया गया है कि तीन साल पहले तक 2.6 लाख करोड़ रुपए के वस्त्र-बाजार में वुमन क्लॉथ मार्केट एक लाख करोड़ रुपए की थी। इसमें सालाना ग्यारह फीसद का उछाल आ रहा है। इसमें ब्रांडेड वुमन क्लॉथ की वृद्धि दर लगभग बीस प्रतिशत है। इससे बाजार में उसकी हिस्सेदारी बढ़क़र चालीस प्रतिशत के पार पहुंचने की संभावना है। वुमन क्लॉथ पर विदेशी लेबल, विदेशी कंपनियों की प्रविष्टि, कामकाजी महिलाओं की संख्या में लगातार बढ़त, व्यय क्षमता में बढ़ोत्तरी, खुदरा कारोबार की सुगमता, रेडीमेड कपड़ों की ओर बढ़ते रुझान को इसकी खास वजह बताया जा रहा है। घर और बाजार के मनोविज्ञान से वाकिफ विश्लेषकों का कहना है कि पुरुष अपने रोजमर्रा के ज्यादातर कामों में महिलाओं पर ही निर्भर रहते हैं।

उनको सुबह की चाय से लेकर रात में सोने तक सभी कामों के लिए महिला की जरूरत होती है। उनकी यही जरूरत बाजार और कंपनियों को अपनी रणनीति बनाने के काम आ रही है। पुरूष इस बात को भले न मानें, कंपनियों के सर्वेक्षण तो इसी सच को सामने ला रहे हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, महिलाओं के माध्यम से ही चालाक कंपनियां पुरुषों की भी आदत खराब कर डालने की जुगत में हैं। ज्यादातर पुरुष बर्थ डे और मैरिज एनिवर्सरी भूल ही जाते हैं अथवा अपने पाटर्नर पर डिपेंड रहते हैं। पुरुषों की आदत होती है कि वे अपने अपसेड मूड को किसी और किसी की बजाय सिर्फ महिला पार्टनर से साझा करते हैं। न बताने पर महिलाएं ऐसी फिलिंग स्वयं ताड़ लेती हैं और बाजार के लटकों-झटकों, उनकी पंसद की डिश, होटल-रेस्टोरेंट की वॉकिंग के साथ उनका मूड ठीक करने में लग जाती हैं। इतना ही नहीं, वे पुरुष की जेब तंग होने पर वक्त-बे-वक्त बचाए गए अपने पैसों से पुरुष का फाइनेंशियल सपोर्ट भी कर देती हैं। इसीलिए आज बाजार और कंपनियों की पहली दिलचस्पी खरीदार महिलाओं में बनी हुई है और उसका उन्हें अकूत मुनाफा भी मिल रहा है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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