"यह अच्छी तरह याद रखना, जब तुम घर की चौखट लांघोगी, लोग तुम्हें टेढ़ी मेढ़ी नज़रों से देखेंगे"

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मैं जानती हूं कि मैं जबतक भी ज़िंदा हूं ,कटघरे में हूं ,

क्योंकि मैं खुद ही अपनी दीवार हूं -- (विस्साव शिंबोर्स्का)

बिना प्रतिबद्धता के मिशन हो या प्रोफेशन असामाजिक है। प्रतिबद्धता की डिमांड सबसे पहसे सामाजिक सरोकारों से जुड़ने की है। इन्हीं सरोकारों में सर्वप्रथम स्थान आता है सूचना तंत्र के तमाम उपकरणों को फिर चाहे वह प्रिंट हो, इलेक्ट्रॉनिक हो या नवइलेक्ट्रॉनिक। मीडिया बनाम सोशल मीडिया में स्त्री कब, कहां और कैसे-कैसे भूमिका निबाहती है मैं इसी केंद्रीय मुद्दे पर अपनी बात रखूंगी।

एक साथ दो तस्वीरों को जोड़कर अपनी बात की शुरुआत करना चाहती हूं—पहली तस्वीर यह कि बिहार में एक बुज़ुर्ग महिला को खटिया पर लादकर वोटिंग के लिए ले जाया जा रहा है और वो अपना वोटर आई कार्ड मीडियावालों को दिखा रही हैं। दूसरी तस्वीर झारखंड की, जहां कुछ महीनों पहले दहेज के रुप में एक महिला ने पति को अपनी किडनी दे दी। फिर भी पति का शोषण कम नहीं हुआ। किडनी प्रत्यारोपण के छह महीने बाद महिला ने खुद को आग के हवाले कर आत्महत्या कर ली। दोनों तस्वीरें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की ही हैं। मुझे तसलीमा नसरीन की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं.... यह अच्छी तरह याद रखना/जब तुम घर की चौखट लांघोगी/लोग तुम्हें टेढ़ी मेढ़ी नज़रों से देखेंगे/जब तुम गली से होकर गुजरोगी/लोग तुम्हारा पीछा करेंगे सीटी बजाएंगे/जब तुम गली पार करके मुख्य सड़क पर पहुंचोगी/लोग तुम्हें चरित्रहीन कहकर गालियां देंगे/तुम व्यर्थ हो जाओगी अगर पीछे लौटोगी/वरना जैसे जा रही हो बढ़ती जाओ...


जब देश समाज और सूचना तंत्र का पुर्जा-पुर्जा व्यावसायिकता की चपेट में है ऐसे में ‘स्त्री’ को कितने और कैसे जोखिम से गुजरना पड़ता है इसकी भी जांच पड़ताल होनी चाहिए। अब जबकि पूरा का पूरा विश्व बाज़ार में तब्दील हो चुका है ऐसे में स्त्री हो या पुरुष वह या तो उत्पाद बनता है या फिर उपभोक्ता। वह मनुष्य की श्रेणी में तो कतई नहीं रखा जाता। व्यवसाय हमेशा मुनाफे की संस्कृति से जुड़ता है। इसीलिए मैंने मीडिया को हाईपर मीडिया कहा, क्योंकि जो मानवीय मूल्य(संतोष, प्रेम, सौहार्द्र, दया ममता भाईचारा) खरीदे बेचे नहीं जा सकते वे हाशिए पर हैं। इनका कोई मोल नहीं। इस हाईपर मीडिया बाज़ार में ये कौड़ी भर हैसियत नहीं रखते। यह हाईपर मीडिया केवल मुनाफा, प्रतिस्पर्धा, साजिश और सनसनी की भाषा समझती है। ऐसे में प्रतिबद्धता की बात करना भी बेमानी है। यहां सदाशयता के लिए कोई स्पेस नहीं।

जब चुनावी बयार बहने लगते हैं तो महिलाओं की याद सबको आने लगती है और उसके बाद निर्भया जैसी घिनौनी घटनाओं के बाद नेताओं के बोल फूटते हैं। ये सारे तथ्य इसलिए रखने की कोशिश कर रही हूं ताकि आपको समझ में आए कि राजनीति करना, जनता को गुमराह करना, गुब्बारों की तरह वायदे करना, ये सब अलग-अलग मसले हैं और महिलाओं के लिए वाकई काम करना अलग है...


संचार माध्यमों पर जबतक राजनीति हावी रहेगी और प्रशासन व्यवस्था का हस्तक्षेप जारी रहेगा या कह लें पूंजी जबतक देश का माई बाप है, ऐसे प्रजातांत्रिक देश की बेटी, बहन, मां असुरक्षित ही होगी। अस्तित्व, अस्मिता और स्वाबलंबन के प्रश्न अब गलाकाट प्रतियोगिताओं की भेंट चढेगी। वरना क्या कारण है कि यह सोशल मीडिया सर्वहारा कमजोर वर्ग स्त्री और बच्चों के प्रति अपनी वास्तविक जवाबदेही नहीं निभा पाती। इस उदासीनता और व्यापार बुद्धि के पीछे किसके और कितने हित निहित हैं। मीडिया का उद्देश्य केवल ग्लैमर और पैसा कमाना(मुनाफे की संस्कृति) तक ही सीमित क्यों हो गया है? स्त्री और बच्चा दोनों को इस सूचना तंत्र ने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया है। पर्व त्यौहार, पारस्परिक सम्बन्धों, वैवाहिक उत्सवों और ऐसे न मालूम कितने वैयक्तिक, निजी भाव अनुभाव आज बाज़ार में बिकने के लिए खड़े अपना दाम लगाते दिखाई देते हैं।

साहित्य में आज की तारीख में दो ही विमर्श सबसे ज्यादा चर्चा में है...दलित और महिला। दुर्भाग्य है कि यहां भी पुरुषों के हिसाब से महिलाओं को चलना पड़ रहा है...जो महिलाएं अपने हिसाब से साहित्य में सक्रिय हो रही हैं उनके लिए तो रास्ते कठिन हैं। वजह है पुरुष लेखकों का साहित्य में किलाबंदी। अगर क़िला भेदने की कोशिश की तो फिर तय है आप चोटिल होंगे, ज़ख्म खाएंगे। और अगर आप क़िला में आसानी से प्रवेश करना चाहते हैं तो फिर राजाओं की शर्तों पर खरे उतरना होगा...ज़ाहिर है महिलाओं को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगा। भ्रामक वादों और लुभावने शब्दों को समझना होगा और उसके विरोध में काट तैयार करना होगा।

अभी युद्ध विराम हुआ है भाई/ खत्म नहीं हुई है तुम्हारे हिस्से की लड़ाई/ देखना वे फिर सटने की कोशिश करेंगे/ जो कल साथ छोड़ गए थे तुम्हारा/ जो दे रहा है मंजिल होने का भ्रम/ एक पड़ाव है तुम्हारी लंबी यात्रा का/ थक गए हो तो थोड़ा सुस्ता लो/ पर देखना कहीं निश्चिंत होकर सो मत जाना—निर्मला पुतुल

यही कारण है कि इस हाईपर मीडिया में कभी क्राइम, क्रिकेट और कॉमेडी बिकाऊ है तो कभी सिनेमा, सिलिब्रिटी और सेक्स से जुड़ी खबरों ने तमाम अहम राजनीति, आर्थिक और सामाजित मुद्दों को बहस में लाने से पहले ही मार दिया है।


यह हाईपर मीडिया स्त्री को भी कई खेमे दे देता है। अमीर स्त्रियां, ताक़तवर स्त्रियां, संभ्रांत, भरपेट स्त्रियां, ग़रीब बेसहारा, पिछड़ी, पेशेवर स्त्रियां। ये सभी स्त्रियां प्रोडक्ट बनाकर उघारी और परोसी जा रही हैं। स्त्रियां सब जगह फूहड़ घटिया और अश्लील शोज का केंद्र बनती हैं। केवल उद्दाम, उत्तेजना से भर देने वाली कपोल कल्पित दमित इच्छाओं को उकसाती हैं, जिनसे कभी भी किसी घर परिवार देश समाज का संस्कार नहीं बन सकता।

आइए कुछ निरुत्तरित प्रश्नों से मुठभेड़ किया जाए---जब कोई स्त्री बिना औरतपन के दबाव को महसूसे पुरुष सत्ता को चुनौती देती है तब वह अनुमान से नहीं अनुभव से लड़ती है। बशर्ते वह सबकुछ बताने पर राजी हो जाए तो सत्ता और व्यवस्था उसका अस्वीकार करती है। इसके बाद तरह-तरह के लांछन लगाए जाते हैं। पुरुष जब भी स्त्री यातना पर बात करता है हमदर्द बनकर, स्त्री को सब्जेक्ट बनाकर उसकी पीड़ा का अनुमान भर लगाता है। परंतु जब स्त्री अपना दर्द बताती है तो उसे उसके दूरगामी परिणाम भोगने पड़ते हैं। ऐसे में सहभागिता और समानता के लिए वातावरण बनाना होगा। स्त्री की जुझारु छवि को बड़े कैनवास पर दिखाने की हुज्जत होनी चाहिए। इसे हम अमेरिका के ब्लैक मूवमेंट से जोड़ सकते हैं। विश्व व्यापी नारीवादी आंदोलनों में इस प्रश्न को बार-बार उठाया गया। अधिसंख्य नारीवादी स्त्री के उत्पीड़न पर बात करते रहे। पुरुषों के स्त्रियों पर नियंत्रण, पूंजीवादी व्यवस्था का सामंती सोच वर्ग विभेद में इसके कारणों की खोज की जाती रही। यहां कुछ अहम सवाल उठाने ही होंगे...स्त्री के अनुभवों में समरुपता किस घरातल पर खोजी जाए? क्या नारीवादी आंदोलन अपनी भूमिका सही ढंग से निबाह रहे हैं? क्या स्त्रियों को अलग से संगठित होना चाहिए? अथवा दलगत संगठनों की महिला समिति के रूप में कार्य करना फिर से हाशिए पर खड़े होना नहीं है। इन कुछ सवालों से आज का समय और समाज बचता रहा है। बावजूद इसके कि चाहे समय हो, समाज, राजनीति, साहित्य जगत-- स्त्री विषयों का उपयोग अपने-अपने हित में सबने किया। परिणाम यह हुआ कि स्त्री के सवालों का जवाब देने के बजाय स्त्री हित टुकड़ों में बंट गए। मैं पुरजोर ढंग से इसे मानती हूं कि इस बंदरबांट का विकृत रूप महिला आरक्षण में, जातिगत आरक्षण की मांग के दौरान देखने में आई। ऐसा क्यों है कि स्त्री को स्त्री से तोड़ा गया। स्त्री के हित सार्वभौम हित हैं। पर यहां उसे हिंदु स्त्री, मुस्लिम स्त्री, ईसाई स्त्री और दलित स्त्री के रूप में विभाजित कर दिया। जब कहा जाता है इस्लाम खतरे में है और हिंदुत्व खतरे में है तो कहने के तर्ज़ में कोई फर्क नहीं होता। आज भी धार्मिक कट्टरता का उन्माद सबसे बड़ा स्त्री उत्पीड़क है। सरकार सती प्रथा के संबंध में जो विधेयक सामने लाई उसने सती होने को आत्महत्या निरुपित कर दिया और स्त्री फिर से दंड की पहली अधिकारिनी बन बैठी।

धार्मिक कट्टरता की ही तरह बाज़ार ने भी स्त्री का खूब शोषण किया। पूंजी के साम्राज्य में स्त्रियां सेंध लगाती हुई दिखाई दीं। जहां सौंदर्य प्रतियोगिताएं हैं, विक्रेता स्त्री है, उपभोक्ता स्त्री है और वह सेल्सगर्ल भी है। बाज़ार में आकर स्त्री ने परंपरागत संरचना से मुक्ति पाने की ठानी। पर अपनी देह पर अधिकार और नियंत्रण, विवेकी मस्तिष्क पर नियंत्रण और अधिकार छोड़ती गई। उसे लड़ाई अपने दम पर लड़नी होगी। बाज़ार की संरचना से उसे अपने को मुक्त करना होगा। स्त्री को देह, श्रम और विवाह के ही धरातल पर आंका गया। बावजूद इसके भारत की आधी आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा ‘चूल्हा चौका और शयन कक्ष के वध स्थल’ की दुनिया के बाहर की दुनिया से अपरिचित अपनी नियति स्वीकार कर रही है। अगर उपयुक्त परिवर्तन के परिणाम चाहिए तो हमें इस स्त्री तक भी पहुंचना होगा। बलात्कार की शिकार हरिजन महिला तमाम तरह के फेमनिस्ट आंदोलनों, भड़काऊ नारों और कभी-कभी पीसफुल कैंडिल मार्च का सबब बन जाती है। मीडिया पर बेबाक बोलती ये स्त्रियां भी वस्तुत: कुछ नहीं कर रही होती हैं। ये भरपेट महिलाएं उन तमाम भूखी नंगी लुटी महिलाओं पर केवल विचार विमर्श करती हैं और हमारी हाईपर मीडिया फैब्रिकेशन जुटाकर अपनी टीआरपी बनाती है। बलात्कार की शिकार महिला की अस्मिता और अस्तित्व से जुड़े तमाम मुद्दे इस जनतांत्रिक समाज को खबरदार करने से पहले ही नजरअंदाज कर दिए जाते हैं।

धरती के इस छोर से उस छोर तक/ मुठ्ठी भर सवाल लिए मैं/ दौड़ती हांफती भागती/ तलाश रही हूं सदियों से निरंतर/ अपनी ज़मीन, अपना घर, अपने होने का अर्थ (निर्मला पुतुल)

यहां मैं एक छोटे से उदाहरण से अपनी तमाम तर्क की पुष्टि करना चाहूंगी, जो केवल इस देश और समाज में नहीं अंतरराष्ट्रीय तौर पर उजागर हुआ। सोलह दिसंबर 2012 का निर्भया बलात्कार कांड दिल्ली महानगर की खबर होने के नाते तमाम न्यूज चैनल्स, पत्र-पत्रिकाओं, अखबारों, सोशल साइट्स पर बड़ी सुर्खियां बटोरती रही। यहां एक वाजिब सा प्रश्न उठता है कि क्या उसके पहले या उसके बाद बलात्कार की घटनाएं नहीं हुईं। या वो कब और किन कारणों से दबा दी जाती रहीं। क्योंकि बलात्कारियों की जात और जमात नहीं होती ऐसे ही महिला को जात और जमात में क्यों बांटा जा रहा है। क्या मेट्रोपॉलिटन में घटने वाली घटनाएं अन्य छोटे शहरों और कस्बों से कुछ अलग महत्व रखती है या बलात्कार की शिकार महिला शहरी और कस्बाई होने की नाते उसकी अस्मत में कुछ फर्क आ जाता है।

वो घटनाएं सुर्खियां क्यों नहीं बटोर पातीं? यहां बड़ा जायज़ सा सवाल उठता है कि यह हाईपर मीडिया केवल घटनाओं को सनसनीखेज बनाकर परोसने का काम ही करती रहेगी या वह उस घटना के पीछे के कारणों, उनके सभी जिम्मेदार पहलूओं और उनके रोकथाम के कारगर उपायों को ढूंढने में कोई सरोकार निभा पाएगी? मीडिया की भूमिका मध्यस्थता निभाने में है। भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न घटें इसके रोकथाम के लिए आवश्यक सुझाव ढूंढने में है न कि बिकाऊ होने में।

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डॉ सुधा उपाध्याय आज की हिन्दी की लेखिकाओं में महत्वपूर्ण स्थान बना रखती हैं। अविधा सुधा उपाध्याय की सबसे बड़ी ताक़त है। अलग तेवर की वजह से डॉ सुधा उपाध्याय साहित्य और आलोचना जगत में बिलकुल अलग दिखती हैं। कविता और कहानी में जिस तरह वो समाज, इतिहास और राजनीति के सूक्ष्म बिंदुओं को पकड़ती हैं आलोचनाओं में कृति के समाजशास्त्र, सौंदर्य बोध और उसके तलीय स्वर को पकड़ने का साहस करती हैं। एक शिक्षक होने के नाते समाज के हर उस शख्स के लिए वो आवाज़ उठाती हैं जो शिक्षा से वंचित रह जा रहा है। कविता, कहानी, लेख और आलोचना में इसकी झलक साफ नज़र भी आती है। किसी अनर्गल विमर्श में न पड़कर एक स्वस्थ संवाद कायम करने में विश्वास रखती हैं। इनके दो कविता संग्रह ‘इसलिए कहूँगी मैं’और ‘बोलती चुप्पी’ प्रकाशित हो चुकी है। सुधा पेशे से अध्यापक हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज में असोसिएट प्रोफेसर हैं।

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