सूझबूझ से नवीन ने भरी 2.2 अरब डॉलर की ऊंची उड़ान 

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 अमेरिका ने चांद पर रोबोटिक यान ले जाने के लिए उन्हें लाइसेंस जारी किया है। नवीन कुमार जैन भी पहले नौकरी करते थे। उन्हीं दिनो उनका मन ऊंची उड़ान के लिए फड़फड़ाता रहा। 

अब्दुल कलाम के साथ नवीन कुमार
अब्दुल कलाम के साथ नवीन कुमार
आईआईटी रुड़की से इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद उन्होंने एक्सएलआरआई जमशेदपुर से एमबीए किया। कालांतर में उनका परिवार शामली से गाजियाबाद शिफ्ट हो गया।

 हिम्मत, मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती। इस कहावत को नवीन कुमार ने हकीकत में कर दिखाया है। नवीन कुमार के दादा दाताराम शामली में गुड़ के एक व्यापारी थे।

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे निकल कर नवीन कुमार माइक्रोसॉफ्ट साझीदार, फिर इंफो स्पेश कंपनी के फाउंडर बने। अब मून एक्सप्रेस के फाउंडर और चेयरमैन हैं। फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन ने पहली बार किसी निजी कंपनी मून एक्सप्रेस को चंद्रमा पर उपग्रह भेजने का लाइसेंस दिया है। कंपनी चांद पर मानव अस्थियां भी ले जाएगी। नौकरी और बिजनेस, दोनो के अपने-अपने चैलेंजे हैं। सीमित और आरामदेह सोच नौकरी की ओर ले जाती है, लेकिन जो किसी भी तरह की चुनौती पर पार पाते हुए जीवन में कुछ कर गुजरना चाहते हैं, कर दिखाना चाहते हैं, उन्हें ठलुआ क्लब जैसी जिंदगी कभी रास नहीं आती है। वह मुश्किलों से जूझना ही नहीं जानते, चाहते हैं, उन्हें अपने वक्त को जीतना भी आता है।

हम बात कर रहे हैं शामली (उत्तर प्रदेश) के एक ऐसे ही शख्स की नवीन कुमार जैन की। अपने छोटे से उपनगर से निकलकर नवीन कुमार ने कुछ ऐसा कर दिखाया है, जिस पर उनके घर-परिवार ही नहीं पूरे देश को नाज होना चाहिए। अमेरिका ने चांद पर रोबोटिक यान ले जाने के लिए उन्हें लाइसेंस जारी किया है। नवीन कुमार जैन भी पहले नौकरी करते थे। उन्हीं दिनो उनका मन ऊंची उड़ान के लिए फड़फड़ाता रहा। वह लगातार खुद के स्टार्टअप में माथा धुनते, लगातार अपने आइडिया पर प्रयासरत रहे। कोई राह चलता रहे तो मंजिल मिल ही जाती है।

आखिरकार एक दिन वह नौकरी को ठोकर मारकर अपनी राह चल पड़े, और आज वह अपने उद्यम, अपनी मेहनत से 2.2 अरब डॉलर (14,300 करोड़ रुपए) के स्वामी हैं। इतना ही नहीं, अब तो वह 'फोर्ब्‍स' पत्रिका के मुताबिक दुनिया के डेढ़ सौ अमीर उद्यमियों में एक हो चुके हैं। इस समय वह इंफो स्पेस कंपनी और मून एक्सप्रेस के फाउंडर हैं। उनकी कंपनी का प्रोडक्‍ट चांद पर जाएगा। हिम्मत, मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती। इस कहावत को नवीन कुमार ने हकीकत में कर दिखाया है। नवीन कुमार के दादा दाताराम शामली में गुड़ के एक व्यापारी थे।

वर्ष 1947 में निकटवर्ती कस्बा कैराना (मुजफ्फरनगर) से शामली में आकर तालाब रोड जैन धर्मशाला के पास एक मकान में रहने लगे थे। उसी घर में नवीन जैन का जन्म छह सितंबर 1959 को हुआ था। वहीं से उन्होंने 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की। उनके पिता नरेंद्र जैन लोक निर्माण विभाग में प्रदेश के विभिन्न जनपदों में तैनात रहे। उस दौरान उनकी बाकी पढ़ाई लिखाई अन्यत्र होती रही। आईआईटी रुड़की से इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद उन्होंने एक्सएलआरआई जमशेदपुर से एमबीए किया। कालांतर में उनका परिवार शामली से गाजियाबाद शिफ्ट हो गया। बाद में नवीनकुमार रोजी-रोजगार के लिए अमेरिका चले गए। वहां उनके भाई भी एक कंपनी में नौकरी कर रहे थे।

नवीन कुमार ने काफी समय तक माइक्रोसॉफ्ट के साथ काम किया। इंफो स्पेश कंपनी के फाउंडर बने। फिर मून एक्सप्रेस के फाउंडर और चेयरमैन। फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन ने पहली बार किसी निजी कंपनी मून एक्सप्रेस को चंद्रमा पर उपग्रह भेजने का लाइसेंस दिया है। निजी कंपनी के तौर पर चांद मिशन के लिए लाइसेंस पाने के बाद जैन का कहना था कि 'मून लाइसेंस के लिए आकाश सीमित नहीं है। यह उसके लिए लांचपैड है। आने वाले समय में हम चांद से बहुमूल्य धातु और चट्टान लाएंगे।' वर्ष 2010 में स्थापित इस कंपनी के सह संस्थापकों में जैन, बॉब रिच‌र्ड्स और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञ बर्नी पेल हैं।

सबसे रोमांचक सूचना यह है कि मून एक्सप्रेस की चांद पर कॉमर्शियल कार्गो के साथ मानव अवशेष भी भेजने की योजना है। कंपनी ने चांद पर अस्थियां ले जाने की भी योजना बनाई है। एक किलो अस्थियां भेजने के लिए 30 लाख डॉलर (करीब 20 करोड़ रुपये) चुकाने पड़ेंगे। दाह संस्कार के बाद आमतौर पर चार से छह पाउंड तक अवशेष बचते हैं। इस लिहाज से इसे भेजने के लिए 54 लाख डॉलर (करीब 36 करोड़ रुपये) से लेकर 81 लाख डॉलर (करीब 54 करोड़ रुपये) देने होंगे। इस तरह की सेवा की अत्यधिक मांग हैं। जैन के पास ऐसी मांग करने वालों की लंबी सूची है। 

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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