हिमाचल के एक गांव में शुरू हुआ ऑर्गेनिक खेती का स्टार्टअप

लोगों की हेल्थ को दुरुस्त रखने के लिए देश के कई किसानों ने ऑर्गेनिक खेती करनी शुरू कर ही है। ऑर्गेनिक खेती यानी जानवरों के गोबर या तमाम खाद्य अपशिष्टों से बनाई गई खाद। इसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि इससे न तो उगने वाली फसल जहरीली होती है और न ही खेत की मिट्टी खराब होती है।

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वक्त के तेजी से बदलने के साथ ही हमारे खान-पान की आदतों में भी काफी बदलाव आया है। अब ज्यादातर लोगों के पास ये सोचने तक कि फुरसत नहीं है कि वे जो खा रहे हैं वो उनके लिए कितना फादेमंद है और कितना नुकसानदायक। आज देश में ज्यादातर फसलें और सब्जियां केमिकल फर्टिलाइजर्स और पेस्टीसाइड्स की मदद से उगाई जाती हैं। ये बात सच है कि देश की इतनी बड़ी आबादी को बिना केमिकल फर्टिलाइजर्स के खाने-पीने की चीजें उपलब्ध कराना मुश्किल है, लेकिन आप शायद न जानते हों कि इनकी मदद से उगाया गया अन्न या सब्जियां आपके लिए काफी घातक हो सकती हैं। इन्हीं की वजह से तमाम नई-नई बीमारियां जन्म ले रही हैं और देश का हर व्यक्ति किसी न किसी बीमारी की चपेट में आ जा रहा है।

हिमाचल प्रदेश के करसोग वैली में स्थित इस गांव में किसानों के एक ग्रुप ने ऑर्गैनिक खेती शुरू की है।
हिमाचल प्रदेश के करसोग वैली में स्थित इस गांव में किसानों के एक ग्रुप ने ऑर्गैनिक खेती शुरू की है।
अभी किसान जिस केमिकल फर्टिलाइजर्स का इस्तेमाल अपनी खेती में करते हैं उसे सिंथेटिक रूप से आर्टिफिशल तरीके से बनाया जाता है। उसमें तमाम तरह के केमिकल्स डाले जाते हैं। इससे फसल तो काफी अच्छी होती है, लेकिन ये जमीन और हमारे शरीर पर भी बुरा असर डालते हैं और इसकी मदद से उगाए गए अन्न या सब्जियों के सेवन से कई तरह की बीमारियां जन्म लेती हैं।

आप सोच रहे होंगे कि हम तो हरी सब्जियां, ताजे फल या शुद्ध दाल, चावल, आटे का ही इस्तेमाल करते हैं। लेकिन आपको नहीं पता होता कि ये सब रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशक की मदद से तैयार किया जाता है। इसी नुकसान से बचाने और लोगों के स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए देश के कई किसानों ने ऑर्गेनिक खेती शुरू की है। ऑर्गेनिक खेती यानी जानवरों के गोबर या तमाम खाद्य अपशिष्टों से बनाई गई खाद। इसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि इससे न तो उगने वाली फसल जहरीली होती है और न ही खेत की मिट्टी खराब होती है। अभी जो केमिकल फर्टिलाइजर्स का इस्तेमाल किसान करते हैं उसे सिंथेटिक रूप से आर्टिफिशल तरीके से बनाया जाता है। उसमें तमाम तरह के केमिकल्स डाले जाते हैं। इससे फसल तो काफी अच्छी होती है, लेकिन ये जमीन और हमारे शरीर पर भी बुरा असर डालते हैं और इसकी मदद से उगाए गए अन्न या सब्जियों के सेवन से कई तरह की बीमारियां जन्म लेती हैं।

अॉर्गेनिक खेती से सफलता की दास्तान लिखने वाली तमाम कहानियां सामने आ चुकी हैं। जहां अच्छी खासी जॉब छोड़कर युवाओं ने अॉर्गेनिक खेती को अपनाया और सफलता की नई इबारत लिख डाली है। ऐसे ही यूपी के ग्रेटर नोएडा में खेड़ी भनौटा गांव के छह लोगों का एक ग्रुप अॉर्गेनिक खेती कर रहा है। इस ग्रुप में नंदिनी दिएश, रामिश तांगरी, सुभाष पालेकर, दिनेश शर्मा, विजय भसीन और अमित राणा हैं। ऐसे ही पुणे में IT कंपनी में अच्छी खासी जॉब छोड़कर 27 साल के जयवंत पाटिल ने सभी अॉर्गेनिक खेती करने वाले किसानों को ग्राहकों के साथ जोड़ने के लिए एक वेबसाइट बनाई है जिससे किसानों को अॉर्गेनिक फूड बेचने में काफी मदद मिलेगी।

"अॉर्गेनिक खेती से मिट्टी संरचना में तो सुधार होता ही है साथ ही खेत में पोषक तत्वों को रखने की क्षमता में भी बढ़ोत्तरी होती है। वहीं अॉर्गेनिक खाद पूरी तरह से प्राकृतिक तत्वों से बनी होती है। इसके कई फायदे होते हैं। जैसे खेत की मिट्टी पर कोई बुरा असर नहीं होता और उगने वाली फसल में पूरे पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं। जो हमारे लिए बिल्कुल भी हानिकारक नहीं होते। हालांकि इससे फसल की पैदावार पर जरूर असर होता है।"

कुछ सालों से केमिकल फर्टिलाइजर्स और हानिकारक पेस्टीसाइड्स पर निर्भर किसानों का रुझान ऑर्गैनिक फार्मिंग की तरफ जरूर बढ़ा है, लेकिन ऐसे किसानों को अपनी फसल या सब्जियां बेचने में काफी मुश्किल होती है।

ऐसी ही एक कहानी पंगना गांव की भी है। हिमाचल प्रदेश के करसोग वैली में स्थित इस गांव में किसानों के एक ग्रुप ने अॉर्गेनिक खेती शुरू की है। अभी किसानों का यह ग्रुप और अॉर्गेनिक खेती करने वाले अधिक किसानों को जोड़ने की कोशिश कर रहा है। इस ग्रुप के फाउंडर सोमकृष्णन गौतम ने आज से आठ साल पहले 12 लोगों के साथ मिलकर इस ग्रुप की शुरुआत की थी। आज ये ग्रुप अपनी-अपनी जमीनों पर 25 अलग-अलग की किस्मों की फसल उगा रहा है।

"इसरो के नेतृत्व वाले एक अध्ययन से मिले सैटेलाइट पिक्चर्स से पता चला है कि भारत की लगभग 30% मिट्टी में कमी आई है, जबकि देश का 25% भौगोलिक क्षेत्र मरुस्थली है। केमिकल फर्टिलाइजर्स की वजह से ही मिट्टी को काफी नुकसान पहुंच रहा है। अगर जल्द ही ऑर्गैनिक खेती नहीं अपनायी गई तो दीर्घकालिक नुकसान पहुंच सकता है। ऑर्गेनिक खेती को इसका समाधान माना जा सकता है। देश में कई किसानों ने अॉर्गेनिक खेती को अपनाया भी है, लेकिन पर्याप्त प्रोत्साहन न मिलने के कारण इस क्षेत्र में उतना विकास नहीं हो पा रहा जितनी जरूरत वास्तव में है।"

क्या है ये पंगना शॉप?

अॉर्गेनिक खेती करने वाली पंगना गांव के किसानों की सबसे बड़ी दिक्कत है बाजार और खेती करने के तरीके को और अच्छे से जानने की। किसानों के पास पैसे की कमी है उनके पास संसाधन तो हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल कैसे करना है, ये उन्हें नहीं पता। किसानों को यकीन ही नहीं है कि रसायनिक खेती को छोड़कर अॉर्गेनिक तरीके से खेती करके अच्छा फायदा कमाया जा सकता है। पंगना शॉप यही काम करता है। वो किसानों को अच्छी अॉर्गेनिक फसल तैयार कराने में मदद करता है और फसल का पूरा दाम भी दिलाने की कोशिश करता है।

पिछले कुछ सालों में केमिकल फर्टिलाइजर्स और हानिकारक पेस्टीसाइड्स पर निर्भर किसानों का रुझान अॉर्गेनिक फार्मिंग की तरफ जरूर बढ़ा है, लेकिन ऐसे किसानों को अपनी फसल या सब्जियां बेचने में काफी मुश्किल होती है। वहीं शहर में अॉर्गेनिक फूड्स की चाहत रखने वाले लोगों की शिकायत है, कि पैसे देने के बावजूद उन्हें अच्छी अॉर्गेनिक सब्जियां या अन्न नहीं मिल पाते। ऐसे में अगर किसानों और ग्राहकों के बीच पंगना शॉप जैसा कोई सिस्टम बन जाये तो दोनों को फायदा होने लगेगा।


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